भाषा-साहित्य

भविष्य का साहित्य और साहित्य का भविष्य 

यह ऊपर लिखी बेहद प्रभावशाली लगती परंतु वास्तव बेसिर पैर की पंक्ति है। जिसमें शब्दों का अपव्यय तो है ही कोई सार्थकता भी नहीं है। ऐसी पंक्तियां करीब दशक से देखता आ रहा। पहले पहल काफी प्रभावित हुआ,जब पढ़ा “साहित्य की चेतना चेतना का साहित्य” 

या “आज की कविता और कविता का आज”, यथार्थ का गल्प और गल्प का यथार्थ, विमर्शों का भविष्य और भविष्य के विमर्श इत्यादि इत्यादि। इन सबका कोई औचित्य और सार समझ नहीं आता। क्योंकि जहां भी गोष्ठी,सेमिनार,पत्रिकाओं के विशेषांक में यह लिखा होता,वहां कथ्य और वक्ता वही कमजोर होते।केवल दो तीन नामवर को छोड़कर। मजेदार बात यह कि बिना अर्थ और भाव समझे लगा दिया शीर्षक।

 मुझे बड़ी कोफ्त,खीझ होती की वाराणसी,प्रयागराज का हो या दिल्ली,पटना,कोलकाता, आसनसोल का सेमिनार मुख्य वाक्य ऐसे ही कुछ ,”मनुष्य का साहित्य साहित्य की मनुष्यता” होते। अब पूछो इन कालिदास… नहीं नहीं, मार्क्स, मार्खेस, सात्र,देरिदा,काफ्का के नकली एकलव्यों से की साहित्य मनुष्य के अलावा और किसका होता है? क्या कोई अन्य विकल्प हैं जिसके आधार पर आपने “मनुष्य” पर विशेष जोर दिया? क्या पशुओं,वनस्पति का भी साहित्य होता है? यदि होता भी है तो उन्हें वह पढ़ते कैसे हैं? पढ़ते भी हैं तो उनकी भाषा आप कैसे जानते हो? बस चारण वंदना कर रहे क्योंकि उनके आकाओं ने ऐसा शीर्षक दिया था,तो हम भी देंगे। उसी आका को हवाई जहाज से बुलाएंगे।धन का ऐसा अपव्यय कहीं नहीं देखा। 

जयपुर के एक आज की कविता नामक कार्यक्रम ,जिसे बोध ज्ञान प्राप्त उस वक्त युवा और फिल्मों में घोस्ट लेखन कर रहे,कवि चला रहे थे। मोटी फंडिंग थी तो तीन दिवसीय कार्यक्रम था। दोनों जगह उनका राज् था,मनमोहन सिंह और अशोक गहलोत थे। सारे कवि जमा थे एक जाजम पर।पुणे से कानपुर और इंदौर से पटना तक। बाद में ज्ञात हुआ सभी हवाई यात्रा का सुख लेकर आए थे।

एक स्वनामधन्य बड़े कवि हुए,उससे पहले बड़े प्रोफेसर मोटी पगार,सब सुविधाएं वह मुख्य अतिथि थे पर फ्लाइट विलंब से समय पर नहीं आ पाए दिल्ली से। वह भोजन पूर्व आए,दो चमचेनुमा लड़के कवि,जो आगे जाकर साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ में सुशोभित हुए,उन्हें लेने गए। वह आए,तीस मिनट क्या बोले कुछ समझ नहीं आया। पर औरा था बड़े कवि हैं,जल्दी जल्दी सत्र समाप्त बाकी वक्ता रोके गए कि अगले में कविता पढ़ देना। दो अधिक इच्छुक बालाओं (महिलाएं) को एक एक कविता पढ़वा दी। बड़े कवि ने सुनी,तारीफ की। मैं नया नया कविता और कवियों के तौर तरीके देख सीख रहा था।पर सच कहूं, मुझे आज तक नहीं आए कि बेकार, व्यर्थ की कविता पर वाह वाही करना और सामने वाले को अंधेरे में रखना। उन्होंने तारीफ की कविता की तुलना महादेवी वर्मा से की।

  सुंदरियों के चेहरे दमके।पर आज डेढ़ दशक बाद वह कहां है कोई नहीं जानता। तो बड़े कवि के लिए प्रिय चमचा सफेद कुर्ते पजामे में प्लेट में कुछ ले आया। मैने भी मौका देख उनके हाथ में अपना प्रथम काव्य संग्रह,वह स्त्री लिख रही है,जिसमें श्रमिक,वंचित और टूटते सपनो की कविताएं हैं, दिया। उन्होंने उसे प्रेम पूर्वक लिया मुझे शुभकामनाएं दी। फिर बाहर चल दिए।क्योंकि उनकी तीन बजे कोलकाता के लिए फ्लाइट थी। बड़ा कवि अब हवाई जहाज से चलता है और एक दिन में दो शहरों में कार्यक्रम अटेंड करता है । दो घंटे रहे और रवाना कोलकाता जहां उनका एक घर भी है। हिंदी कविता,नए कवियों और पाठकों को मार्गदर्शन करने ही आयोजकों ने बुलाया था पर क्या हुआ मार्गदर्शन? दिख गए यही काफी है। मैने भी इसके बाद कभी किसी को किताब भेंट नहीं की।

  वहीं कविता पाठ की आस लिए मैं चार घंटे बैठा रहा। अरुण आदित्य,गीत चतुर्वेदी,अशोक कुमार पांडे,अशोक मिश्र सहित कई लोग थे। जयपुर के जाने माने नाम गायब थे ,जो आगे वर्षों में मैंने देखा हर जगह पान में चूने की तरह फिट होते। वही तीन चार नाम। एक दशक बाद कुछ युवा दोस्तों ने यह नेक्सस तोड़ा। 

पर बात मैंने शुरू की थी उलट पलट कर लिखे बीज वाक्य से। काफी जगह देखने और खोजबीन के बाद मेरे हाथ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबंध की पुस्तक लगी। मेरे ज्ञानचक्षु खुले। उसमें उसी तरह का शीर्षक था पर सारगर्भित। फिर “दूसरी परम्परा की खोज” मैंने पढ़ी, उनके पट शिष्य ,पटरानी की तर्ज पर,यशस्वी आलोचक और प्रोफेसर नामवर सिंह की। साठ के दशक में लिखी यह पुस्तक उनके विभिन्न निबंधों का संकलन है।उसमें भी कृतज्ञ शिष्य ने द्विवेदी जी के विरोधी आचार्यों की पुस्तकों और विचारों की पाश्चात्य मार्क्सवादी विचारकों की बातों के आधार पर आलोचना कम एक तरफा गुरुभक्ति दिखाई है।इसी कारण पुस्तक मुझे कमजोर लगी।जब नामवर जी ने पीएचडी कर रहे थे गुरुवर द्विवेदी जी के सान्निध्य में उस वक्त ही यह लिखी गई थी। भावुकता और गुरु ऋण चुकाने की जल्दबाजी में आखिर के कुछ निबंधों में तो द्विवेदी जी की कृतियों को तुलसी और सूर से भी बड़ा सिद्ध कर दिया। यह उस पुस्तक में बाकायदा दर्ज है। चूंकि नामवर जी ,रामचंद्र शुक्ल फिर राम विलास शर्मा जी की बेहिचक,निर्मम आलोचना करते करते शीर्ष पर आ गए थे तो सब चलता रहा। आगे खुद नामवर जी अपनी इस प्रारंभिक पुस्तक से संतुष्ट नहीं थे। मुझे लगता है द्विवेदी जी को कैसा लगा होगा शिष्य का यह प्रयास? उस वक्त वह शांति निकेतन में पढ़ा रहे थे। दो उनके शिष्य और आगे चर्चा में रहे एक नंगातलाई का गांव,व्योमकेश दरवेश वाले प्रोफेसर विश्वनाथ त्रिपाठी और दूसरे अभी शतायु हुए बिना दीवारों का घर,वाले प्रोफेसर राम दरश मिश्र। सोचता हूं गुरुवर द्विवेदी को यह भी जानते होंगे पर यह कभी कुछ बोले क्यों नहीं? शायद इसे ही साहित्यिक समझदारी कहते हैं। 

तो उस पुस्तक में मुझे फिर गुरु की परम्परा का पालन करते हुए ऐसे शीर्षक दिखे “भाषा का भविष्य ,भविष्य की भाषा” तब समझ आया कि जो पिछले दशक से ऊलजुलूल तुक वाले शीर्षक देख रहा था उसका आदि स्त्रोत क्या था? अनेक नहीं हजारों ऐसे अक्ल के कोरे हिंदी के अकादमिक जगत में मोटी तनख्वाह ले रहे जिनके पास मौलिक सोच नहीं। उससे अधिक साहित्य में ऐसे हैं जो आंख बंद करके इन्हीं की नकल कर रहे बिना अपनी बुद्धि लगाए। यहां हिंदी जगत का भविष्य अंधकारमय लगता था। पर कहते हैं न ईश्वर सब देखता और इंसाफ करता है। तो हिंदी जगत में,दोनो तरफ ऐसी नई पीढ़ी आ चुकी है जिसने यह सब पढ़ा सुना ही नहीं, समझना तो दूर की बात है। तो वह अपने अपने ढंग से हिंदी जगत की नदी में सड़े गले विचार,कचरा और जूठन डाल रहे। करो भागीरथी को स्वच्छ। 

    तभी चुटकुलों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी होती है तो प्रवासी साहित्य पर भी ।बोलने वाले कोई भी हो विदेश की गृहणी, पियक्कड़ बुढ़ा अथवा पति परिवार कर्तव्य निभाकर कविता लिखती असंख्य नौसिखिए उसे लाकर मंच पर बैठा देते।

         अभी मज़ेदार बात यह हुई कि शीर्षक पढ़कर ही हंसी आ गई।

जब से भारतीय ज्ञानपीठ पराई हुई है तब से नया ज्ञानोदय निरंतर अधोगति को जा रही। मधुसूदन आनंद ,संपादक, पत्रकार का साहित्य से उतना ही संबंध है जितना ट्रंप का समझदारी से और धोनी का ईमानदारी से। आधे अंक में विदेशी कहानियों के अनुवाद,बाकी में चुन चुनकर पत्रकार साथियों के आलेख।जिन्होंने कभी नया ज्ञानोदय और भारतीय ज्ञानपीठ का नाम भी नहीं सुना,पढ़ा वह लिख रहे।

    प्रभाकर शोत्रिय,रविंदर कालिया,लीलाधर मंडलोई जैसे संपादकों ने कहां तक पहुंचाई पीठ को। और यह कहां ले जाकर मानेंगे? गलती वाणी वालों की भी है जिन्होंने टेकओवर तो किया परन्तु पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रहे। उन्हें कोई भी अच्छा व्यक्ति संपादन हेतु नहीं मिला। मुझे ले सकते हैं जिसे गैली से लेकर प्रूफ और काव्य से लेकर आलोचना तक का पच्चीस वर्षों का अनुभव है।दिल्ली भी आने को तैयार है। 

अभी निजाम बदलते ही पत्रिका त्रैमासिक हो गई। 

तो अभी अभी विशेषांक आया है कथेतर गद्य पर,नवंबर चौबीस अंक। समझ आ गया क्यों लगभग अपढ़ व्यक्ति को अतिथि संपादक बनाया।कोई समझदार तैयार नहीं हुआ ।शायद पैसे कम देते होंगे।क्योंकि स्तरीय विद्वान स्तरीय कार्य करने के पैसे भी स्तरीय लेगा।

तो अतिथि संपादक ने आधे से अधिक सामग्री आर्काइव से ली ,शेष किताबों से साभार,वह भी राजकमल और वाणी की।कुछ वही पुरातन अथवा सोए हुए साहित्यिक शून्य पत्रकारों के लेख लेकर यह भानुमती का पिटारा सौ रुपए मूल्य का निकला।आजादी के बाद के सभी अच्छे गद्यकार हैं तो उनके गद्य तो अच्छे हैं।पर अधिकतर मेरे पढ़ें हुए हैं चाहे प्रेमचंद,गुलेरी, महादेवी,निर्मल वर्मा,रविंदर कालिया पर अखिलेश हो या वही गुट विश्वनाथ त्रिपाठी,मंगलेश डबराल,राजेश जोशी आदि।पर नए लोग और जो कम पढ़ते हैं उनके लिए यह विशेषांक उम्दा चयन है। कविताएं और कवि से कोई खास वास्ता नहीं होता पत्रकारों का तो वह खंड,हिस्सा छुआ ही नहीं।

बात अतिथि संपादक उमाशंकर चौधरी की जिसमें बिल्कुल भी नई बात या मौलिकता नहीं। वही घिसी पिटी लीक। शीर्षक ही बेसिर पैर का जिसकी कोई तुक,सेंस ही नहीं। “कथेतर का भविष्य और भविष्य में कथेतर” दोनो का अर्थ समान है और कोई नई बात नहीं। हालांकि जो गुट के लोग हैं वह भले ही वाह वाह करे, क्योंकि बेहद कम पढ़ें हैं और जो पढ़े हैं वह भी आकाओं का। 

हिंदी साहित्य में विगत कुछ वर्ष से कथा,कहानी,कविता,गज़ल के इतर यह विधा बहुत लोकप्रिय है। इसमें डायरी,संस्मरण, आत्मकथा,यात्रा वृतांत, रेखाचित्र,लेख आदि आते हैं। मासिक पत्रिका साहित्य अमृत पिछले वर्ष एक समृद्ध विशेषांक कथेतर गद्य पर,प्रबुद्ध कवि और विनम्र व्यक्तित्व वाले मित्र लक्ष्मी शंकर वाजपई के संपादन में निकाल चुका है।वह अविस्मरणीय था। सरस्वती सुमन भी नए विषयों पर अंक निकाल चुकी है वृद्ध विमर्श, पुरुष विमर्श पर भी।

भारतीय ज्ञानपीठ की एक परम्परा,पहचान और उससे बढ़कर उम्मीदें हैं हिन्दी के पाठकों और जगत को उसे उसका ख्याल रखना चाहिए। दिन पर दिन रचना चयन कम करने का क्या अर्थ है? जब वाणी की सीईओ अदिति माहेश्वरी अभी सम्पन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में करोड़ों की किताबों की बिक्री से अच्छी तरह वाकिफ हैं।अर्थात अच्छा साहित्य और उसे पढ़ने वाले बढ़ रहे हैं। तो फिर ज्ञानपीठ को तो दो पत्रिकाएं प्रारंभ करनी चाहिए।बहुवचन और पुस्तक वार्ता की तरह। एक नया ज्ञानोदय दुबारा मासिक करें और दूसरा राजकमल की आलोचना,सामयिक की नई सरस्वती जैसे अपनी भी आलोचना ,पुस्तक समीक्षा की बेहतरीन त्रैमासिकी प्रारंभ करें। वही उचित और स्वागत योग्य होगा। पिछले वर्षों में छत्तीसगढ़ मित्र, व्यंजना के कुछ अंकों का अतिथि संपादन किया मैने किया। उससे खुशी है काफी नए पाठक भी जुड़े और अंकों को सराहा भी गया।पाखी के अपूर्व जोशी से भी मिलना और बात हुई कई बार। दरअसल प्रकाशक को खुद संपादक बनने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। संपादन की लंबी और समृद्धशाली परम्परा रही है। उम्मीद है कुछ तो असर होगा।–

— डॉ. संदीप अवस्थी

डॉ. संदीप अवस्थी

कथाकार,कवि 804,विजय सरिता एनक्लेव बी ब्लॉक पंचशील,अजमेर,305001 7737407061