तरक़्क़ी का पोस्टमार्टम
शहर बोला मैं तरक़्क़ी की मिसाल बन गया,
पेड़ बोला अरे मैं फ़ाइल में सवाल बन गया।
नदियाँ बोलीं अब हमें नाली का दर्जा मिला,
नेता बोले देखिए, कैसा ये कमाल बन गया।
ठेकेदारों ने कहा वो जंगल बहुत बेकार लगे,
काट डाला,प्लॉट निकला, मालामाल बन गया।
हवा बोली अब साँस लेने की फीस लगेगी क्या?
धुआँ नें बोला मैं उद्योगो का ख़याल बन गया।
बारिश आई तो शहर में नाव भी चलने लगें,
बोले अफ़सर ये भी पर्यटन का हाल बन गया।
पंछियों ने ट्वीट किया की घर हमारा छिन गया,
नेटवर्क बोला मगर सिग्नल तो धमाल बन गया।
बच्चे पूछ रहे पेड़ क्या होते हैं, मम्मी ये बताओ,
तब किताब बोली मैं भी अब सवाल बन गया।
धरती बोली मुझे माँ कहते थे सब आज तक,
अरे विकास बोला बेच मैं तो दलाल बन गया।
और जो बोले सच ज़रा, वो कहलाया देशद्रोही,
चुप्पी बोली मैं यहाँ सबसे बड़ा ढाल बन गया।
हँस के कहता हैं “सोमेश” सब ठीक चल रहा है,
विनाश तो बस नाम बदल, “विकास” बन गया।
— सोमेश देवांगन
