मर्यादा न भूल जाना
करिए ‘इज़हार-ए-मोहब्बत’ बाबू-शोना,
‘सभ्यता-संस्कृति’ का ‘ध्यान’ रख लेना।
पवित्र प्रेम की मर्यादा को न भूल जाना,
सच्चे प्यार को ‘सार्वजनिक’ ना बनाना।
माना कि ‘इजहार’ के बहुत से हैं तरीके,
तुम रास्ते चलते भी नहीं खोना सलिके।
इश्क तो ‘छुपाए’ भी कहीं नहीं हैं छुपता,
सिर अपने पालकों के सामने हैं झुकता।
याद रखिए शाश्वत प्रेम ही है दीपक राग,
ऐसा कोई कदम न उठाना की लगे दाग।
पालकों इश्क ‘परवान’ चढ़े सहमति देना,
दु:खद अंत हो ऐसी नौबत ना आने देना।
— संजय एम तराणेकर
