मुक्तक/दोहा

दोहा

बसंत


मातु शारदे दे रहीं, जन मन नेह दुलार।
शीश झुकाकर लीजिए, उनका पावन प्यार।।

आम वृक्ष दिखने लगे, यहाँ-वहाँ अब बौर।
नई- नई नित कोंपलें, जमा रही हैं ठौर।।

पीली चादर ओढ़कर, धरती लगे सुजान।
पक्षी कलरव कर रहे, मानव मन मुस्कान।।

पतझड़ संग बसंत भी, दस्तक देता द्वार।
ठंड विदाई ले रही, माघी बहे बयार।।

सबसे ऊंची देखिए, मेरी उड़े पतंग।
जन मानस को मोहता, अंबर का बहुरंग।।


सतगुरु देव


सतगुरु सुमिरन कीजिए, मन प्राणी विश्वास।
और स्वयं को मानिए, तू है सबसे खास।।

सतगुरु इक आधार है, समझ रहा संसार।
फिर नाहक क्यों कर रहा, निंदा नफरत रार।।

सुबह सबेरे कीजिए, सतगुरु चरण प्रणाम।
छोड़ फिक्र परिणाम की, करिए अपने काम।।

सतगुरु पर विश्वास का, सीख लीजिए मंत्र।
वो ही देंगे आपको, सुखदा जीवन यंत्र।।


धरा


हरियाली की चाह में, धरा हुई बेचैन।
मानव गुस्ताखियाँ, भिगो रही हैं नैन।।

गिद्ध लुप्त होते धरा, छिनता उनका ठौर।
प्राण बचाने के लिए, ठाँव ढूँढ़ते और।।

आज धरा भी को रही, अपना असली रूप।
यत्र- तत्र ही छाँव है, ज्यादा ही है धूप।।

दूषित होती जा रही, धरा आज भरपूर।
संकट जीवन का बढ़े, हम स्वारथ में चूर।।

धरा धर्म की कीजिए, सभी पालना आज।
नहीं धर्म दूजा बड़ा, करना है जो काज।।

जल, जंगल संग मेदिनी, संरक्षण का भार।
सब मिल आज उठाइए, जीवन का है सार।।


धार्मिक


मंगल मंगलमय बने, कृपा करें प्रभु राम।
हनुमत के दरबार में, गूँजे राम का नाम।।

सुनो विनय अब आइए, प्रथम पूज्य गजराज।
भक्तों की दुश्वारियाँ, दूर करो अब आज।।

शिव गौरी के लाल को, करिए सभी प्रणाम।
उनकी जब होगी कृपा , पूरण होंगे काम।।

शिव शंकर कृपा करो, मेरी भी फरियाद।
पहले सब पर कीजिए, मम पर सबके बाद।।


शनिदेव


शनीदेव जी की कृपा, मुख फैले मुस्कान।
उनके भक्तों का सदा, बढ़े मान सम्मान।।

फ़ुरसत में हों जब कभी, मम पर भी दें ध्यान।
राह निहारूं आपकी, शनीदेव भगवान।।

छाया नंदन भूलिए, होता हमसे पाप।
मानो हम नादान हैं, हरो कष्ट संताप।।

मैं भी तो कहता यही, होती हमसे भूल।
इसका मतलब यह नहीं, आप चुभाओ शूल।।

सूर्य पुत्र देते नहीं, ओर हमारे ध्यान।
या फिर है ये आपका, कोई नया विधान।।

द्वार आपके हो खड़े, भक्त करें फरियाद।
अर्जी इनकी लीजिए, या फिर आएं बाद।।

शनी तुला पर तोलते, पाप-पुण्य का भार।
समता मूलक न्याय का, यह उनका आधार।।


विविध


ईश कृपा इतनी रहे, सदा सभी के साथ।

मन वाणी सद्भावना, हृदय बसें रघुनाथ।।

दोहा लेखन कीजिए, करिए सभी विचार।
प्रेम प्यार सद्भावना, कस फैले संसार।।

रिश्तों का नित हो रहा, होता कत्लेआम।
जैसे तैसे चल रहा, छिपकर सारा काम।।

मोबाइल का बढ़ रहा, नित्य नया उपयोग।
सुरसा डायन की तरह, बढ़ता जाता रोग।।

मानव का अब देखिए, कैसे बदले रंग।
गिरगिट भी यह देखकर, परेशान अरु दंग।।

मौसम भी दिखला रहा, हमें आइना रोज।
संग चिढ़ाता नित्य है, ये है तेरी खोज।।

संसद में जो हो रहा, हमें नहीं स्वीकार।
काम नहीं कुछ हो रहा, ठनी हुई बस रार।।

टूट रहे परिवार हैं, विकसित कटु संबंध।
हर रिश्ते से आ रही, महज स्वार्थ की गंध।।

कब तक निज से भागकर, बचे रहोगे आप।
सोचा था कल क्यों नहीं, करते थे जब पाप।।

कोशिश करके देख लो, इतना तो अधिकार।
शायद फिर सजने लगे, तेरा भी दरबार।।

सत्ता किसकी है यहाँ, नहीं भूलना आप।
पछताने से है भला, मानो अपना पाप।।

सत-पथ पर जो चल रहे, डरें नहीं वो लोग।
निंदा नफरत आड़ में, फैलाते नहिं रोग।।

धन दौलत की आड़ में, करते गंदे काम।
लालच में जो फँस गया, वही हुआ बदनाम।।

भारी दुख भी समय से, दम देता है तोड़।
जीवन में आता सदा, ऐसा इक दिन मोड़।।

जिंदा हो तो चाहिए, देखे दुनिया रोज।
देना पड़ता है कहाँ, इसकी खातिर भोज।।

जिंदा रहने के लिए, करें सभी संघर्ष।
पर ऐसे भी लोग हैं, करते खूब विमर्श।।

गंदा बंदा भला क्यों, करिए सोच विचार।
मान रहे मजबूर या, वो मेरे सरदार।।

बंदा होकर हार क्यों, मान रहे हो मित्र।
उठो और आगे बढ़ो, नया खींच दो चित्र।।

दुख अपना हल्का करो, संग किसी से बाँट।
बदले में चाहे पड़े, तुमको थोड़ी डाँट।।

उठो और आगे बढ़ो, इंतजार में राह।
बस थोड़ी सी कीजिए, पैदा मन में चाह।।

मुझ पर इतना आप क्यों, करते रहे यकीन।
नहीं पता क्या आपको, मैं हूँ बड़ा जहीन।।

आज किसी पर अब नहीं, करिए आप यकीन।
कल सुनने से है भला, बनकर रहिए दीन।।

नेता इस लायक नहीं, जनता करे यकीन।
ऊपर से भोले दिखें, भीतर बहुत मलीन।।

आप बड़े बेवकूफ हो, क्यों कर करें यकीन।
मीठे अपने ख्वाब हैं, बन जायें क्या दीन।।

बेंच बाँच खाली हुए, झाड़ें दोनों हाथ।
धन दौलत जागीर क्या, सँग में जब रघुनाथ।।

अपनी तो जागीर है, मातु पिता का साथ।
मैं अमीर सबसे बड़ा, सिर पर उनका हाथ।।

खूब दिखावा कीजिए, माँग समय की आज।
अपने घर को फूँककर, आप कीजिए राज।।

कौन दिखावा कर रहा, जाने सकल जहान।
फिर भी दुनिया कह रही, बंदा बड़ा महान।।

हरे भरे संसार को, देख रहे हम आप।
इसीलिए तो कर रहे, बड़े प्रेम से पाप।।

*सुधीर श्रीवास्तव

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