कविता

संतोष

अब संतोष नहीं है होता।
भले बहुत कुछ हूँ मैं खोता।।
व्यर्थ नहीं अब कुछ समझाओं।।
हमें नहीं संतोष सिखाओ।।

संतोषी है मारा जाता।
मूरख जग में वो कहलाता।।
संतोषी तमगा पाओगे।।
पागल होकर मर जाओगे।।

कब तक तुम संतोष करोगे।
बच्चों को भूखा मारोगे।।
कोई नहीं सोचने वाला।
दुनिया वालों का दिल काला।।

सारा जग संतोषी होए।
कभी नहीं जब कोई रोए।।
तभी धरा खुशहाल दिखेगी।
मीठी सी मुस्कान बहेगी।।

आओ इक अभियान चलाएं।
ज्योति एक संतोष जलाएं।।
ऐसा पावन मंत्र सुनाएं।
जग संतोष गीत हम गाएं।।

*सुधीर श्रीवास्तव

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