अन्त में सिर्फ अन्त ही होता है
ढलती धूप कहे
पत्तों पर अंतिम स्पर्श
समय मुस्काए
शाख से गिरकर
पत्ता धरती से मिले
चक्र पूर्ण हुआ
साँझ की निस्तब्ध
पगडंडी सुनसान है
कदम रुक जाते
नदी का जल भी
समुद्र में खो जाता
नाम मिट जाते
दीपक की लौ
अंधेरे में समर्पित
धुआँ रह जाता
जीवन का पथ
अंतिम मोड़ बताता
विराम सत्य है
हर विदा में
नव आरम्भ छिपा है
प्रकृति समझाए
अन्त में केवल
अन्त ही सत्य ठहरे
शांति उतरती
— डॉ. अशोक
