बड़ा भाई
अनायास ही इस जीवन में
कई कंधे भारी हो जाते हैं,
कम उम्र में ही कुछ लोग
घर की चहार दीवारी हो जाते हैं।
समुद्र चाहे कितना गहरा हो,
जहाज़ को डुबा न पाता है,
वैसे ही बड़ा भाई अक्सर
घर को डूबने से बचाता है।
कच्ची उम्र में सपने छोड़कर
ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ लेता है,
अपने हिस्से की खुशियाँ
चुपचाप कहीं तोड़ देता है।
अनायास ही इस जीवन में
वो पहले कमाने जाता है,
घर की हर ज़रूरत को
अपने माथे पर उठाता है।
लेकिन सालों बाद यही दुनिया
उससे सवाल कर जाती है,
“तुमने किया ही क्या है?”
सवालों से पीड़ा बढ़ जाती है।
वो पराया-सा लगने वाला
असल में सबसे अपना होता है,
कोई पार लगा देता है घर को
कोई खुद ही डूबा होता है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
