किशोरों और मानसिक स्वास्थ्य : एक बढ़ता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट
भारत आज तेजी से बदल रहा है — तकनीकी रूप से, आर्थिक रूप से और सामाजिक तौर पर विकसित हो रहा है। परन्तु ऐसे बदलते परिदृश्य में एक गंभीर संकट उभरता हुआ दिख रहा है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं: हमारे किशोरों (युवाओं) का मानसिक स्वास्थ्य। समाज में तबाही लाने वाले युद्ध, आर्थिक संकट या महामारी से तो हम सजग रहते हैं, लेकिन किशोरों के मनोवैज्ञानिक संकट को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता में नहीं रखते — इसका परिणाम भविष्य में राष्ट्र के लिए और भी अधिक गंभीर हो सकता है।
भारत सरकार के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NHMS) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 12 राज्यों में 13-17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 7.3 प्रतिशत किशोर मानसिक स्वास्थ्य विकारों से प्रभावित हैं। इस सर्वेक्षण के परिणाम संसद में साझा किए गए थे, और यह आंकड़ा बताता है कि यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। यह 7.3 प्रतिशत की संख्या अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि हम इस अनुपात को भारत की किशोर आबादी की तस्वीर के साथ जोड़ते हैं — जहां लगभग 43 करोड़ बच्चे और किशोर हैं — तो यह लाखों युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करते हुए दिखाता है। यह स्थिति रोज़मर्रा के आनंद, सीखने की क्षमता, सामाजिक संबंध और भविष्य की संभावनाओं पर गहरा असर डालती है।
इस संकट का एक बड़ा कारण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का सीमित दायरा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च लगभग कुल स्वास्थ्य बजट का 1% से भी कम है, और शिक्षित मनोचिकित्सकों की संख्या अत्यंत कम है — केवल लगभग 0.75 मनोचिकित्सक प्रति 1,00,000 लोगों पर, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश कम से कम 3 प्रति 1,00,000 है। यह दिखाता है कि सेवा ढांचा इतना कमजोर है कि ज़रूरतमंद को समय पर सहायता मिलना आंशिक रूप से या बिल्कुल नहीं हो पाती।
मानसिक स्वास्थ्य का संकट केवल बीमारी की संख्या से मापा नहीं जा सकता; यह समाज के व्यवहार से भी स्पष्ट होता है। UNICEF की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में युवा आबादी में सिर्फ 41% लोग मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता लेना “सही” मानते हैं, जबकि अन्य देशों में यह औसत 56 से 95 प्रतिशत के बीच है। इससे स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी कई वर्गों में कमज़ोरी या बेहद सामान्य व्यवहार के रूप में देखा जाता है, न कि एक चिकित्सीय आवश्यकता के रूप में। किशोरावस्था वह आयु है जो व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और सामाजिक विकास में निर्णायक भूमिका निभाती है। इस काल में 50 प्रतिशत मानसिक विकार उम्र 14 तक और लगभग 75 प्रतिशत मध्य 20 के दशक तक प्रकट होने की प्रवृत्ति होती है, जैसा कि वैश्विक शोध दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि किशोर काल में अगर लक्षणों की पहचान और सहयोग न दिया जाए तो यह विकार स्थायी और गंभीर रूप ले सकते हैं।
यह संकट केवल आंकड़ो की कहानी नहीं है; यह वास्तविक जीवन का अनुभव भी बन चुका है। तनाव, चिंता, अकेलापन, दबाव और आत्म-तुलना आज के किशोरों के मानसिक परिदृश्य का हिस्सा हैं। स्कूलों और कॉलेजों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सीमित संसाधन, कैरियर की अनिश्चितता और पारिवारिक अपेक्षाओं ने किशोरों पर भारी दबाव डाला है। भारत में युवा वर्ग में लगभग 60 प्रतिशत मानसिक विकार 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों में पाए गए हैं, यह दर्शाता है कि मानसिक स्वास्थ्य अब केवल वृद्धावस्था या बाद की उम्र की समस्या नहीं रही। इस व्यापक संकट की एक और गंभीर पहचान यह है कि भारत की बड़ी आबादी मानसिक स्वास्थ्य लक्षणों को पहचानने या स्वीकार करने में देर करती है। सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) के कारण अधिकांश लोग सहारा लेने में हिचकिचाते हैं, और अक्सर यही लापरवाही समस्या को और बढ़ा देती है। कई परिवार व्यवहार को “बदलाव”, “धीमी प्रतिक्रिया” या “आवश्यकता नहीं” मान लेते हैं — जिससे मानसिक स्वास्थ्य समस्या अनदेखी रहकर गंभीर विकार का रूप ले लेती है।
UNICEF तथा भारत सरकार ने मिलकर किशोर अवधारणा पर पीयर-सपोर्ट और समर्थन-आधारित प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किये हैं ताकि किशोरों को एक दूसरे के साथ सहायता देने एवं पहचानने की क्षमता दी जा सके। यह पहल RKSK (राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम) का हिस्सा है और इसका लक्ष्य सामाजिक समर्थन को मजबूत बनाना है, जिससे किशोर समय पर मदद प्राप्त कर सकें। हालांकि पहल सकारात्मक हैं, परंतु गाँवों, कम संसाधन वाले इलाकों और छोटे शहरों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की निवारक क्षमता अत्यंत सीमित है। अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में मनोचिकित्सा केंद्र, काउंसलिंग सेवाएँ या सहायता उपचार सुविधाएँ नहीं हैं, जिससे समस्या गहराती है। UNICEF की रिपोर्ट बताती है कि सेवा ढांचा बच्चों और किशोरों के लिए पर्याप्त रूप से मैप और वितरित नहीं हुआ है, जिससे कई बार परेशानियाँ खत्म होने से पहले ही गंभीर रूप ले लेती हैं।
यही कारण है कि विशेषज्ञों और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि शिक्षा और जागरूकता को प्राथमिकता देना चाहिए। समस्या की पहचान या शब्दों में व्यक्त करना ही समाधान की पहली सीढ़ी है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति पारिवारिक समर्थन, विद्यालयों में काउंसलिंग सेवाएँ, और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सुरक्षित सहायता — ये सभी मिलकर अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आज जब हमारा समाज आगे बढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम “मानसिक स्वास्थ्य” को सामाजिक विकास का अभिन्न हिस्सा समझें। केवल शारीरिक स्वास्थ्य या शिक्षा पर्याप्त नहीं है। समाज का सच्चा विकास तब होता है जब उसे अपने युवा वर्ग की सामाजिक और मानसिक चुनौतियों का समाधान भी मिलता है।
यह भी सत्य है कि आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति या रोजगार के अवसरों में वृद्धि से मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ किया जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब सामाजिक स्वीकार्यता, परिवारिक समर्थन और समर्थन तंत्र का विकास पहले से किया गया हो। अंततः, किशोर मानसिक स्वास्थ्य केवल स्वास्थ्य नीति का विषय नहीं है; यह समाज की नैतिकता, संवेदना और जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब तक हम अपनी युवा पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य की गंभीरता को समझेंगे, उसे प्राथमिकता नहीं देंगे, और उसका समर्थन नहीं करेंगे, तब तक हम एक समन्वित और समृद्ध सामाजिक विकास की दिशा में सही कदम नहीं बढ़ा पाएँगे। आज आवश्यकता है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को स्वीकार करें, बात करें, समर्थन दें और संरचना तैयार करें — न कि उसे अनदेखा या छिपाया करें। यह कदम केवल व्यक्तियों के लिए नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों, परिवारों और देश की सामाजिक प्रगति के लिए अनिवार्य है। किशोरों के लिए मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना — अब इंतज़ार नहीं किया जा सकता।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
