पानी साझा, पंगत साझा
एक घाट का जल
सबके अधरों पर
समान प्यास
धूप तपती है
छाँव बाँटती धरती
मिटे विभाजन
माटी की खुशबू
रोटी की गर्माहट
साझा धड़कन
एक ही पंगत
ऊँच-नीच खोती
मानवता हँसे
नदी कहती है
मत बाँटो धाराएँ
सागर एक
थाली में प्रेम
नमक बराबर
रस बढ़े
हाथों की रेखा
जुड़कर बनती
नई दिशा
पानी साझा
पंगत साझा
भारत सजे
— डॉ. अशोक
