युद्ध के मुहाने पर विश्व
नहीं, अब मन नहीं करता
ना पढ़ने, ना लिखने का।
कुछ विरक्ति होने लगी है
मन भी अनमन रहता है।
शंकाओं से रहता है घिरा
उदासियां रहती हैं घेरे हुए
बढ़ती जा रही हैं बेचैनियां
ग्लोबल युद्ध के दोराहे पर
खड़ी है समूची दुनिया
चूहों के बिलों में घुसे सर्प
विश्व की कुछ महाशक्तियां
कर रही हैं हमले औ’ कब्जे
शांति पुरस्कार के लालच में
बेच रहे विनाशक हथियार।
भय, भूख, बेरोजगारी पर
शासन व्यवस्थाएं हैं मौन
कैसे बचेगी ये दुनिया
अब चिंताएं हो रही मुखर।
— चन्द्र शेखर शर्मा चंद्रेश
