बाल कहानी

श्रेष्ठ बालक

भोगीपुर गाँव के पूर्वी छोर पर फैले सरसों के खेतों के बीच एक छोटा-सा घर था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और सामने तुलसी का चौरा—यही था साकेत का संसार। साकेत लगभग बारह वर्ष का दुबला-पतला, शांत स्वभाव का बालक था। उसके चेहरे पर हमेशा एक गंभीर मुस्कान रहती, मानो उसने जीवन की कठिनाइयों से दोस्ती कर ली हो।
साकेत की माँ घर में ही सिलाई का काम करती थीं।यही उसकी आय का छोटा-मोटा साधन था। पिता का देहांत कई वर्ष पहले हो चुका था। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, परन्तु आत्मसम्मान बहुत ऊँचा था । साकेत पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था और पढ़ाई में अत्यंत मेधावी था।
एक दिन भोर की पहली किरण के साथ साकेत उठ बैठा। माँ आँगन में चूल्हा सुलगा रही थीं।साकेत स्कूल जाने की तैयारी में था।
“माँ, आज मैं स्कूल से लौटकर सीधे बगीचे चला जाऊँगा,और वहाँ माली काका के साथ काम करूँगा। “साकेत ने स्नान करने के लिए जाते हुए कहा।
माँ ने आश्चर्य से पूछा, “बेटा, पढ़ाई का समय कैसे निकालोगे?”
साकेत मुस्कराया, “समय तो निकालना ही होगा माँ। अगर मेहनत करूँगा तो सब सम्भव है।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तू सचमुच मेरा सहारा है साकेत बेटा । लेकिन अपनी पढ़ाई से समझौता मत करना।”
साकेत ने दृढ़ स्वर में कहा, “पढ़ाई ही तो मेरी सबसे बड़ी ताकत है, माँ।आप चिंता न करें, मैं सब सँभाल लूँगा। “
साकेत स्कूल की फीस किसी से उधार नहीं लेना चाहता था। उसने स्कूल के पास रहने वाले एक बूढ़े माली से बात की थी। माली का नाम गजोधर काका था। वे स्कूल के बगीचे की देखभाल करते थे।
एक दिन साकेत ने संकोच से कहा था,
“काका, अगर आप अनुमति दें, तो मैं भी आपकी मदद कर दिया करूँ। बदले में जो उचित समझें, दे दीजिएगा।”
गजोधर काका ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, “अरे बेटा, तू तो पढ़ने-लिखने वाला लड़का है। ये खेत – मिट्टी का काम क्यों करेगा?”
साकेत ने शांत स्वर में कहा, “काका, मेहनत में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। मुझे अपनी फीस खुद भरनी है।”
काका की आँखें भर आईं। “ठीक है बेटा, आज से तू मेरा सहायक।मैं तुम्हें रोज अच्छी तरह समझा दूँगा कि क्या काम करना है। “
अब साकेत स्कूल के बाद बगीचे में पौधों को पानी देता, सूखी पत्तियाँ हटाता और फूलों की क्यारियाँ सजाता। उसके हाथों में छाले पड़ जाते, पर चेहरे पर थकान नहीं आती।
कुछ सहपाठी उसे दूर से देखते और कानाफूसी करते।
एक दिन रमेश बोला, “देखो-देखो, साकेत के पास नए जूते आ गए! पता नहीं पैसे कहाँ से लाता है।”
दूसरा लड़का हँस पड़ा, “अरे, जरूर कहीं से चुराता होगा!”
साकेत ने यह सब सुन लिया, पर चुप रहा। उसने सोचा—सच्चाई को साबित करने के लिए शब्दों की नहीं, समय की जरूरत होती है।
एक दिन स्कूल में विचित्र घटना घट गई। साकेत को लेकर कुछ साथी जाने क्या – क्या कह रहे थे, किन्तु उसने किसी से कुछ पूछना उचित नहीं समझा ।
कुछ शरारती लड़कों ने बात को बढ़ा दिया। वे प्रधानाचार्य कक्ष में पहुँच गए।
“सर, साकेत पर हमें शक है,” रमेश ने कहा।
प्रधानाचार्य, श्री वर्मा जी गंभीर व्यक्ति थे। उन्होंने चश्मा उतारते हुए पूछा, “क्यों? क्या बात है?”
“सर, वह रोज पैसे लाता है। उसके घर की हालत तो अच्छी नहीं है। जरूर कुछ गड़बड़ है।”
प्रधानाचार्य ने शांत स्वर में कहा, “बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं। फिर भी मैं जाँच करूँगा।”
अगले दिन वर्मा जी ने ध्यान से देखा कि छुट्टी के बाद साकेत स्कूल में ही रुक गया है। वे चुपचाप उसके पीछे-पीछे बगीचे तक पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा—वह मिट्टी से सने हाथों से पौधों को पानी दे रहा है।
वर्मा जी ने पास जाकर पूछा, “बेटा, यह सब क्या कर रहे हो?”
साकेत थोड़ा घबराया, पर बोला, “सर, मैं माली काका की मदद करता हूँ।”
“क्यों?”
साकेत ने सिर झुकाकर कहा, “सर, मैं अपनी फीस खुद भरना चाहता हूँ। माँ पहले ही बहुत मेहनत करती हैं। मैं किसी से दया नहीं चाहता।”
वर्मा जी कुछ क्षण चुप रहे। फिर उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा, “तुमने कभी फीस माफी के लिए आवेदन क्यों नहीं दिया?”
साकेत ने आत्मसम्मान से भरे स्वर में उत्तर दिया—
“सर, जब मैं मेहनत करके अपना काम चला सकता हूँ, तो मैं अपनी गिनती असमर्थों में क्यों कराऊँ? मेहनत करने में मुझे गर्व है।मेरे कुछ साथी तो मुझसे भी अधिक गरीब हैं। फीस तो उन्हीं की माफ होनी चाहिए। “
प्रधानाचार्य की आँखें नम हो गईं। उन्होंने साकेत के कंधे पर हाथ रखा, “बेटा, आज तुमने मुझे सिखाया है कि स्वाभिमान क्या होता है।”
अगले दिन प्रार्थना सभा में सभी विद्यार्थी एकत्र थे। वर्मा जी मंच पर आए।
उन्होंने कहा, “आज मैं आप सबको एक सच्चे और श्रेष्ठ विद्यार्थी से परिचित कराना चाहता हूँ।”
सभी बच्चों में कौतूहल था।
“साकेत !” उन्होंने पुकारा।
साकेत सकुचाते हुए आगे आया।
प्रधानाचार्य बोले, “कुछ बच्चों ने इस पर गलत आरोप लगाए थे। पर सच्चाई यह है कि यह बालक अपनी फीस स्वयं कमाता है। यह स्कूल के बगीचे में माली काका के साथ मेहनत करता है और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाता है। ऐसा स्वाभिमानी बालक ही सच्चा ‘श्रेष्ठ बालक’ कहलाने योग्य है।”
पूरा प्रांगण तालियों से गूँज उठा।
रमेश और उसके साथियों के सिर शर्म से झुक गए। सभा के बाद रमेश आगे बढ़ा।
“साकेत भैया , हमें माफ कर दो। हमने तुम्हें गलत समझा।”
साकेत ने मुस्कुराकर कहा, “दोस्तों, सच्चाई देर से सही, सामने आ ही जाती है। चलो, अब मिलकर पढ़ाई करें।किसी साथी के प्रति बिना सच्चाई जाने कभी दोषारोपण न करें।”
उस दिन के बाद स्कूल का वातावरण बदल गया। कई बच्चों ने निश्चय किया कि वे भी समय का सदुपयोग करेंगे। माली काका गर्व से कहते, “हमारे स्कूल का बगीचा ही नहीं, बच्चे भी फूलों की तरह खिल रहे हैं।”
एक दिन प्रधानाचार्य वर्मा जी ने साकेत को अपने कक्ष में बुलाया।
“बेटा, तुम्हारी लगन देखकर विद्यालय प्रबंध समिति ने निर्णय लिया है कि तुम्हें ‘स्वाभिमान छात्रवृत्ति’ दी जाएगी।”
साकेत ने विनम्रता से कहा, “सर, यह आपके आशीर्वाद का फल है।”
वर्मा जी मुस्कराए, “नहीं बेटा, यह तुम्हारी मेहनत का फल है। याद रखो—ईमानदारी और परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाते।”
उसने घर आकर सारी बात अपनी माँ को बतायी, तो माँ ने बड़े प्यार से उसका माथा चूम लिया और ढेर सारा आशीर्वाद दिया।
समय बीतता गया। साकेत अपनी कक्षा में प्रथम आया। गाँव में उसकी चर्चा होने लगी। लोग कहते—“गरीबी कमजोरी नहीं, यदि मन में हिम्मत और हाथों में मेहनत हो।”
कहानी का संदेश :
स्वाभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है तथा परिश्रम सफलता की सीढ़ी ।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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