आसमान के सीने पर
अभी आसमान के सीने पर
बादलों ने ख़त लिखा है
उसमें तेरा-मेरा नाम है लिखा
मगर स्याही थोड़ी घनी हो गई
जो बरसात बनकर उतर आया ।
अभी आसमान के सीने पर
चाँद ने दर्द उकेरा है,
तारों ने आँसू बहाए,
और अब भी तू ज़मीं से रूठा है ।
अभी आसमान के सीने पर
चाँद के आधा होने पर भी
मिलती है उसे पूरी रात,
अधूरी बातें भी
पूरा कर देती है
छोटी-सी किरण भी
अँधेरे को तसल्ली देती है ।
यह भी सच है
जो छूट गया वही साथ चलता है।
रात का कुछ हिस्सा
कभी भी छूट जाता है,
पर जो बचा रहता है
वही हमारे भीतर
एक और आकाश खोल देता है ।
— पारमिता षड़ंगी
