चाटुकार ही करते हैं हस्तियों को बर्बाद
देश और दुनिया में समाज सेवा, राजनीति, मानवीय संवेदनाओं भरे लोक कल्याण कार्यों और धर्म अध्यात्म से लेकर समाज-जीवन और परिवेश विभिन्न क्षेत्रों में रमे हुए लोकमान्य, लोकप्रिय, सिद्ध, तपस्वी और प्रतिष्ठित व्यवसायी, विद्वान, धर्माधिकारी, सामाजिक चिन्तक, मनीषी आदि कही जाने वाली तकरीबन सभी प्रकार की हस्तियां, विभूतियां और प्रतिभाएं एक समय बाद खुद की मौलिकता और स्वभाव को भुला बैठती हैं।
कहने को विराट और व्यापक दायरों में पसरी इन हस्तियों का वास्तविक स्वरूप कछुआ छाप होकर रह जाता है। जैसे-जैसे व्यक्ति की प्रतिष्ठा और समृद्धि का ग्राफ बढ़ता जाता है, शहद के अक्षय छत्तों और अक्षय पात्रों की तरह नज़र आने लगते हैं ये, तब हर किस्म के वैध-अवैध कारोबारियों, नुगरों और चतुर लोमड़ों से घिरने लगते हैं।
धीरे-धीरे इनके पास ऐसे-ऐसे घातक ऑक्टोपसिया जीवों का अभेद्य घेरा बनने लगता है कि बेचारी इन हस्तियों को पता ही नहीं चल पाता कि बाहर की दुनिया उनके बारे में क्या सोच रही है, क्या कुछ चल रहा है। इस स्वार्थलोलुप और तलवे चाटने वाली भीड़ के कारण ये महान विभूतियां अपना आत्म मूल्यांकन तक नहीं कर पाती।
कारोबारियों की यह भीड़ इन श्वेत-श्याम हाथियों को इन्द्रधनुषी रंगों और सुकूनदायी रसों वाला दर्शाते हुए इनका गगनभेदी और पातालफोड़ जयगान करती रहती है, चरणस्पर्श से लेकर साष्टांग और षोडशांग दण्डवत व समर्पण करने का दौर हमेशा परवान पर चढ़ता रहता है।
बेवजह परिक्रमाओं की संख्या जब सारे आंकड़ों को पार कर जाती है और तब खुशी के मारे फूली नहीं समाने वाली ये हस्तियां इतनी अधिक आत्ममुग्ध होकर लोकप्रियता की खुमारी में सर चढ़ जाती हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। इसी का फायदा उठाकर परमुखान्पेक्षी वल्लरियां, परजीवी और पराश्रित लोग अपना वजूद सिद्ध करते हुए जोंक की तरह सब कुछ अपने हक में चूसते रहते हैं।
और इसी खुमारी का फायदा उठाते हुए चतुर सुजान और ऐषणाओं की पूर्ति को ही जीवन लक्ष्य मानने वाले लोग इन कल्पवृक्षों से इच्छित और पूर्व लक्षित वह सब कुछ पाने में जुट जाते हैं जो इनकी कल्पनाओं तक में कभी नहीं रहा होता।
देश और दुनिया में समाज, क्षेत्र और देश के लिए जीने वाले अधिकांश लोग हमेशा अच्छे ही अच्छे काम करते चले जाते हैं, इनमें आरंभिक दौर में कोई बुराई नहीं होती, लेकिन आस-पास के चंगू-मंगू, चुन्नू-मुन्नू, चंटू-बंटू, चेला-चेली, जमूरे-मदारी, शुम्भ-निशुम्भ, खर-दूषण, सेवादार, कारोबारी आदि तमाम किस्मों के किरदार इतने अधिक भ्रमित कर देते हैं कि इन स्वनामधन्य हस्तियों को लगता है कि वे जो कुछ हैं वह इन कारोबारियों के कारण से ही है।
फिर इनमें राजनेताओं, छुटभैये सामाजिक कार्यकर्ताओं, तमाम प्रजातियों के दलालों, कमीशनबाजों, मुफ्तखोरों, ब्लेकमेलरों, प्रोपेगण्डा विशेषज्ञों, तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ और अनुष्ठानों से हर मनचाहे काम करा देने की गारंटी देने वाले सिद्धों, पण्डितों, गौसेवाधारी निष्काम कर्मयोगियों, धंधेबाजों, अपराधियों, उपकृतों, भ्रष्टाचारियों और असामाजिक तत्त्वों का समावेश उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है।
भीड़ भाड़ का बढ़ना और वीआईपी एवं वीवीआईपी कारिन्दों की आवाजाही तथा आत्मीय भाव से आदर अभिव्यक्ति का दिग्दर्शन इन हस्तियों के लिए वह पेरामीटर है जिससे इनकी प्रतिष्ठा, लोकप्रियता और सर्वोच्चता को आंका जाता रहा है। यहां आम लोगों की कोई पूछ नहीं होती, उनका इस्तेमाल केवल तालियां बजाने और चरणस्पर्श करते रहने से लेकर महिमा गान तक ही सीमित रहता है।
कोई इंसान चाहे कितना ही सर्वश्रेष्ठ और उत्तम क्यों न हो, इनकी बदनामी आस-पास रहकर दिन-रात दूहने वाले दुहनियों के कारण होने लगती है। कोई नेता, गुरु अथवा नेतृत्वकर्ता कितना ही अच्छा क्यों न हो, इनके चेले-चपाटियों, मुफ्त में सुविधाएं और संसाधन मुहैया कराने वालों, फाइनेंसरों, रियल एस्टेट कारोबारियों, अतिक्रमण करने-कराने वाले, धौंस एवं गुण्डागर्दी से जमीन-जायदाद के कब्जे छुड़ाने में माहिरों, प्रचार-प्रसार की भूख और सोशल मीडिया पर छाए रहने की प्यास मिटाने वालों, दानदाताओं की नज़दीकियां ही इन्हें ले डूबती हैं क्योंकि आम जनता से दूरी बनाए रखकर ये लोग हस्तियों को भरमाए रखते हैं, फिर मुफत में मिले ऐश्वर्य का मोहजाल इन्हें इतना फंसा लेता है कि ये कुछ सोच ही नहीं पाते।
चमचों, चापलूसों और मिथ्या जयगान करने वालों के लिए ये हस्तियां टकसाल और एटीएम का काम करती हैं जो उनके सारे जरूरी-गैर जरूरी, वैध-अवैध कामों में उत्प्रेरक और सहयोगी की भूमिका में लिप्त हो जाती हैं।
इन मायावी असुरों के पाश में जकड़ी और नज़रबन्द से रहने वाली इन हस्तियों से आम जनता का सीधा सम्पर्क हो नहीं पाता, केवल इनके चमचों और तथाकथित अंधानुचरों से ही होता है।
यथार्थ यह है कि पब्लिक इन खुदगर्ज अनुचरों के श्वेत-श्याम चरित्र, दिखावटी व्यवहार और छुपे हुए एजेण्डों व लक्ष्यों से अच्छी तरह वाकिफ रहती है, इस कारण आम जन में यह धारणा घर कर जाती है कि ये जैसे हैं वैसे ही इनके पालनकार, संरक्षक और आका भी होंगे ही।
यही कारण है कि संवादहीनता के कारण बड़ी-बड़ी हस्तियां अपने निर्धारित काम-काज, स्वभाव और व्यवहार के प्रति बेरूखी से घिर जाती हैं। दुनिया में बड़े-बड़े लोगों की बदनामी किन्हीं बाहरी लोगों के कारण से नहीं हुई, बल्कि उन लोगों के कारण से ही हुई है जिनसे ये हमेशा घिरे रहा करते हैं।
भीड़ तंत्र में खोए और अनुचरों की अपार संख्या से उत्साहित और उल्लसित हस्तियों का हश्र इसीलिए बुरा होता है और एक समय बाद जनमानस को असलियत का पता चल ही जाता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, हस्तियों को संभलने का मौका तक नहीं मिल पाता और पराभव का दौर आरंभ हो जाता है जो सारी साख मिट्टी में मिला देता है और बाद में ये हस्तियां कहीं की नहीं रहती।
ऐसे संकट काल में वे सारे लोग पलायन कर जाते हैं, चुप्पी साध लेते हैं जो इन हस्तियों की झूठन और खुरचन से सांसारिक वैभव का स्वाद पाकर खुद भी हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं और अपनी कई पीढ़ियों तक के लिए बेहतर जिन्दगी का प्रबन्ध कर लिया करते हैं। इन चमचों और चापलूस कारोबारियों का यह कुचक्र यहीं नहीं थमता, अपनी आदत और फितरत के मुताबिक ये फिर दूसरे आकाओं और हस्तियों के डेरों में पहुंचकर वहां भी अपने कारनामों को आकार देते रहते हैं।
इन हालातों में उन हस्तियों को एकान्त के क्षणों में पूरी ईमानदारी और गंभीरता से सोचना चाहिए, जो कि भ्रम, मोह और विलासिता के मायाजाल में फंसे रहकर अपने अनुचरों की भारी-भरकम फौज के इशारों पर कठपुतलियां बने रहकर हर अनचाहे व मनचाहे कामों, कुकर्मों और प्रतिशोध को अंजाम देने में पूरी जिन्दगी खपा देते हैं।
आस-पास की भारी भीड़ उन सारे लक्ष्यों को पा लेती है जिनके लिए हस्तियों का सामीप्य और सान्निध्य पाती हैं, और हस्तियां शनैः-शनैः अपने जीवन लक्ष्यों से भटक कर कहीं की नहीं रहती। जमाने की रीत ही यह हो गई है, धंधेबाज लोग इसी तरह किसी भी श्रेष्ठ व्यक्तित्व का किश्तों-किश्तों में कत्ल करते हुए अपने नापाक मंसूबों में कामयाब होते रहते हैं।
फिर चाहे धर्म क्षेत्र या कर्म क्षेत्र कैसा भी हो। इनके लिए काफी है धर्म का आवरण, राजनीति की खाल या और कोई सा नकाब, परिधान। और कुछ नहीं तो बड़ी सी छतरी का साया। इस परम और शाश्वत सत्य को जो समझ जाते हैं वे दुनिया में नाम कर जाते हैं, जो नहीं कर पाते, उन्हें दुनिया भुला देती है।
— डॉ. दीपक आचार्य
