कविता

मुझे नफरत है पापा

हां मैं बहुत नाराज हूं आपसे,
आपसे मुझे नफरत है पापा,
हमेशा हमसे झूठ बोलते हो,
जहां प्रखर आवाज चाहिए
वहां क्यों सब कुछ म्यूट बोलते हो,
सारी परेशानियां सर पर लेकर
कहते हो कोई समस्या नहीं है,
मैं हूं ना सारी समस्याओं का
मुकम्मल समाधान यहीं है,
हमसे सच छुपाने की ये नौबत आ गई,
खून बेचकर राशन लाने की क्यों नौबत आ गई,
हमारी भूख सहने पर क्या भरोसा नहीं है,
हम पर अविश्वास क्या धोखा नहीं है,
हां पैसा तो कमाते हो,
पर पैसा आने का सोर्स क्यों नहीं बताते हो,
कहीं औलाद की उदर भरने के लिए
हम औलादों से धोखा नहीं है,
हमें विश्वास में ले लेने खोते क्यों मौका नहीं है,
भीख मांगना पाप है आपने ही सिखाया,
रिश्तेदारों से मांगने का गुर कहां से आया,
कर्ज में डूब हमें क्यों पाल रहे हो,
हमारे संघर्ष मय जीवन से
हमें दूर क्यों निकाल रहे हो,
अपने परिवार के प्रति
आपका यह स्वार्थ का चलन
हमारी मर्यादा को उबाल रहा है,
आपका कृत्य हमारी इज्जत उछाल रहा है,
आपका कृत्य हमारा
दुर्गत कर रहा है पापा,
हमें आपसे नफरत है पापा,
जाओ कहीं चुल्लू भर पानी में डूब मर जाओ,
अपने जीते जी ये अपमान न दिखाओ पापा,
हमें नफरत नहीं,
हमें सच चाहिए पापा,
झूठ के बोझ से नहीं
ईमान की रोटी चाहिए पापा।
हमारी आँखों में शर्म नहीं,
सीधी नजर से जीना सिखाओ,
अपने जीते जी
हमें सच का रास्ता दिखाओ पापा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554