गीतिका/ग़ज़ल

इश्क

इश्क में आयी कयामत देखिये।
खत में लिखी जो इबारत देखिये।।

आपकी चाहत में मारे हम गये।
हमपे आयी फिर मुसीबत देखिये।।

चाँद पर जो ये नजर है आपकी।
कुछ तो अपनी आप सूरत देखिये।।

खो न जायें हम कही फिर भीड़ में।
आज दिल ने की बगावत देखिये।।

फूल सी नाजुक होती है बेटियां।
उनको भी मिली अजीयत देखिये।।

वक्त पर थे होश गुम जिनके सनम।
हर जगह उनकी अदालत देखिये।।

बहुओं पर भी ढाये है जुल्मों सितम।
आप तो अपनी जहानत देखिये।।

पाक होती है मुहब्बत रूह की।
कहने से पहले शराफत देखिये।।

— प्रीती श्रीवास्तव

*प्रीती श्रीवास्तव

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