भ्रष्टाचार के विरुद्ध उपयोगी हो सकती है कृत्रिम बुद्धिमत्ता
भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका पर विचार करते समय सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि समस्या का स्वरूप कितना व्यापक और जटिल है। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न आकलनों के अनुसार विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग एक खरब डॉलर रिश्वत के रूप में दिए जाते हैं और लगभग 2.6 खरब डॉलर की सार्वजनिक संपत्ति भ्रष्टाचार के कारण नष्ट होती है। यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग पाँच प्रतिशत मानी जाती है। यह आँकड़ा केवल आर्थिक हानि का संकेत नहीं देता, बल्कि यह बताता है कि भ्रष्टाचार विकास, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक विश्वास को किस हद तक प्रभावित करता है।
भारत की स्थिति भी चिंताजनक है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2024 में भारत 180 देशों में 96वें स्थान पर रहा। यद्यपि देश ने डिजिटल प्रशासन और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी पहलों के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास किया है, फिर भी धारणा के स्तर पर सुधार सीमित रहा है। इससे स्पष्ट है कि केवल नीतिगत घोषणाएँ पर्याप्त नहीं हैं; निगरानी और विश्लेषण की उन्नत प्रणालियों की आवश्यकता है।
पारंपरिक जाँच-पड़ताल की अपनी सीमाएँ हैं। फाइलों का मैनुअल परीक्षण, दस्तावेजों का मिलान और गवाहों से पूछताछ समयसाध्य प्रक्रियाएँ हैं। जब तक अनियमितता प्रमाणित होती है, तब तक अनेक बार साक्ष्य नष्ट हो चुके होते हैं या संबंधित व्यक्ति प्रभाव का उपयोग कर प्रक्रिया को प्रभावित कर देता है। ऐसे परिदृश्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की विश्लेषणात्मक क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तीन प्रमुख क्षमताएँ भ्रष्टाचार-निरोध में उपयोगी सिद्ध हुई हैं—विशाल डेटा का तीव्र विश्लेषण, पैटर्न की पहचान और जोखिम का पूर्वानुमान। एक मानव लेखा परीक्षक सीमित दस्तावेजों की जाँच कर सकता है, जबकि संगणकीय प्रणालियाँ लाखों लेनदेन और अनुबंधों का एक साथ परीक्षण कर सकती हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के अनुसार अधिकांश देशों में सकल घरेलू उत्पाद का 13 से 20 प्रतिशत भाग सार्वजनिक खरीद पर व्यय होता है। इतनी बड़ी राशि के प्रवाह में अनियमितता की संभावना स्वाभाविक है। यदि खरीद प्रक्रिया का विश्लेषण वास्तविक समय में हो सके तो संदेहास्पद प्रवृत्तियों को प्रारंभिक स्तर पर रोका जा सकता है।
ब्राजील का उदाहरण इस दिशा में उल्लेखनीय है। वहाँ के नियंत्रक महालेखा कार्यालय ने “एलिस” नामक प्रणाली विकसित की, जो निविदाओं और अनुबंधों का विश्लेषण करती है। संगठनात्मक दस्तावेजों और आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की रिपोर्टों में उल्लेख है कि यह प्रणाली जोखिम संकेतकों के आधार पर प्रतिदिन सैकड़ों निविदाओं का परीक्षण करती है। वर्ष 2023 में इसने लगभग 1,91,000 खरीद प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया और 4.15 अरब यूरो मूल्य के अनुबंधों से संबंधित 203 लेखा परीक्षण प्रारंभ कराए। 2019 से 2022 के बीच लगभग 1.5 अरब यूरो मूल्य की संदिग्ध निविदाएँ निरस्त या स्थगित की गईं। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि औसत लेखा परीक्षण अवधि 400 दिनों से घटकर लगभग आठ दिन रह गई। स्वतंत्र अध्ययनों में यह भी पाया गया कि ऐसे मामलों में वित्तीय हानि में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी आई। ये आँकड़े दर्शाते हैं कि यदि डेटा संरचित और उपलब्ध हो तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता त्वरित चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य कर सकती है।
यूक्रेन का सार्वजनिक खरीद मंच “प्रोज़ोरो” भी पारदर्शिता के लिए चर्चित रहा है। इसके अंतर्गत विकसित निगरानी तंत्र ने अनुचित आपूर्तिकर्ता चयन की पहचान में उल्लेखनीय वृद्धि की। उपलब्ध विश्लेषणों के अनुसार मिलीभगत की पहचान में लगभग तीन गुना तक वृद्धि दर्ज की गई। प्रतिदिन हजारों निविदाओं पर निगरानी रखने की क्षमता ने नागरिक समाज और प्रशासन के बीच विश्वास बढ़ाने में भूमिका निभाई।
कोलंबिया में विकसित “विज़ीआ” प्रणाली उच्च जोखिम वाले अनुबंधों को पूर्व-चिह्नित करती है। लिथुआनिया में भी यूरोपीय संघ के वित्तपोषित परियोजनाओं में जोखिम संकेतकों के मूल्यांकन हेतु संगणकीय मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि अब ध्यान केवल अनियमितता पकड़ने पर नहीं, बल्कि उसे घटित होने से पहले रोकने पर केंद्रित हो रहा है।
वित्तीय क्षेत्र में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका बढ़ी है। वैश्विक वित्तीय घोटालों के बाद अनेक बैंकों ने संदिग्ध लेनदेन पहचानने के लिए उन्नत विश्लेषण प्रणालियाँ लागू कीं। विश्व बैंक द्वारा विकसित शासन जोखिम आकलन प्रणाली ने ब्राजील में स्थानीय निकायों के अनुबंधों में जोखिम चिह्नित करने में सहायता की। यह प्रणाली विभिन्न डेटाबेस—जैसे वेतन अभिलेख, सामाजिक कार्यक्रमों की सूचियाँ और प्रतिबंधित कंपनियों की जानकारी—को जोड़कर विश्लेषण करती है।
भारत के संदर्भ में संभावनाएँ व्यापक हैं। आधार, वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क, एकीकृत भुगतान प्रणाली और सरकारी ई-खरीद पोर्टल जैसी डिजिटल अवसंरचनाएँ पहले से मौजूद हैं। यदि इन डेटाबेसों को उन्नत विश्लेषण प्रणाली से जोड़ा जाए तो फर्जी लाभार्थियों की पहचान, कर अपवंचन के पैटर्न और निविदा प्रक्रियाओं में असामान्य प्रवृत्तियों को शीघ्र चिन्हित किया जा सकता है। कुछ राज्यों में अवैध खनन की निगरानी तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में फर्जी प्रविष्टियों की पहचान के लिए तकनीकी प्रयोग हुए हैं, जिनसे राजस्व की बचत संभव हुई है।
फिर भी यह मान लेना कि तकनीक अकेले समस्या का समाधान कर देगी, यथार्थवादी नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि यदि प्रशिक्षण डेटा पक्षपाती हो या राजनीतिक हस्तक्षेप हो तो संगणकीय प्रणालियाँ स्वयं अन्याय का साधन बन सकती हैं। नीदरलैंड में कल्याणकारी धोखाधड़ी की पहचान हेतु लागू प्रणाली ने आय और दोहरी नागरिकता जैसे संकेतकों के आधार पर हजारों निर्दोष परिवारों को संदिग्ध ठहरा दिया, जिसके कारण गंभीर सामाजिक संकट उत्पन्न हुआ और अंततः प्रणाली वापस लेनी पड़ी।
एक अन्य चुनौती तथाकथित “अदृश्य मॉडल” की है, जिनमें निर्णय की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती। यदि कोई प्रणाली किसी अनुबंध को संदिग्ध घोषित करे परंतु कारण स्पष्ट न कर सके, तो न्यायिक प्रक्रिया में उस निष्कर्ष का उपयोग कठिन हो जाता है। ब्राजील में संसद सदस्यों के व्यय की जाँच हेतु प्रयुक्त एक बॉट ने अनियमितताएँ तो चिन्हित कीं, परंतु उसके निष्कर्ष अभियोजन के लिए पर्याप्त प्रमाण सिद्ध नहीं हुए। इससे स्पष्ट है कि पहचान और दंडात्मक कार्रवाई दो पृथक चरण हैं।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन तथा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम दोनों ने यह रेखांकित किया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखा परीक्षकों और जाँच अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने वाला साधन है, उनका विकल्प नहीं। अंतिम निर्णय प्रशिक्षित मानव अधिकारी को ही करना चाहिए।
भारत के लिए आगे की राह तीन आधारों पर टिकी है। प्रथम, पारदर्शिता—प्रणाली को यह स्पष्ट करना होगा कि उसने किसी मामले को उच्च जोखिम वाला क्यों माना। द्वितीय, मानवीय निगरानी—कोई भी स्वचालित संकेत अंतिम निर्णय नहीं होगा। तृतीय, डेटा की गुणवत्ता और गोपनीयता का संतुलन—दूषित या अपूर्ण डेटा से निकले निष्कर्ष भ्रामक होंगे और नागरिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
निष्कर्षतः, भ्रष्टाचार की समस्या पुरानी है, किंतु उसके विरुद्ध संघर्ष में तकनीकी साधन नए अवसर प्रस्तुत कर रहे हैं। ब्राजील, यूक्रेन और अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि सुव्यवस्थित डेटा और संस्थागत इच्छाशक्ति के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता वास्तविक परिणाम दे सकती है। भारत के पास डिजिटल आधारभूत संरचना और तकनीकी कौशल उपलब्ध है। आवश्यकता है स्पष्ट नीतिगत ढाँचे, उत्तरदायी उपयोग और नागरिक निगरानी की। जब तकनीक को नैतिकता और पारदर्शिता के साथ जोड़ा जाएगा, तभी वह सार्वजनिक धन की रक्षा और शासन की विश्वसनीयता बढ़ाने में सार्थक सिद्ध होगी।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
