ग़ज़ल
अपनी कुर्बानियां जब मैं गिनने लगी,
बेवफाई तेरी और खलने लगी।
तू मेरा अब नहीं भूल बैठी हूं और,
तुझसे मिलने को मैं फिर संवरने लगी।
तेरे ख़त को जलाने चली थी मगर,
मैं इसे फिर से रो रो के पढ़ने लगी।
बेवफ़ा के नगर से मैं जब गुज़़री तो ,
उसके घर के ही आगे ठहरने लगी।
जिस जगह हम मिले थे कभी बे वफा,
उन मुक़ामात पर मैं भटकने लगी।
बे वफाई ने तेरी वो सदमा दिया,
सीधी सादी ये लड़की भी पीने लगी।
लाश की अपनी कुछ सिम्त होती नहीं,
मैं नदी की दिशा में ही बहने लगी।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
