इक्कीसवीं सदी के विश्व में किसी एक राष्ट्र का वर्चस्व स्थायी नहीं रह सकता
बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब शीतयुद्ध का अंत हुआ और सोवियत संघ का विघटन हुआ, तब वैश्विक राजनीति में एक ऐसा क्षण आया जिसे कई विश्लेषकों ने एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय कहा। उस समय संयुक्त राज्य अमेरिका आर्थिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति के शिखर पर था और ऐसा प्रतीत होता था मानो विश्व नेतृत्व स्थायी रूप से उसी के हाथ में चला गया हो। किंतु इतिहास की दीर्घकालिक धारा किसी एक शक्ति के स्थायी प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करती। उस कालखंड में भी विश्व के विभिन्न क्षेत्रों—एशिया के औद्योगिक केंद्रों, उभरती अर्थव्यवस्थाओं, ऊर्जा-समृद्ध क्षेत्रों और पुनर्गठित हो रही शक्तियों—में बहुध्रुवीयता के बीज बोए जा रहे थे। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि वह एकध्रुवीय क्षण स्थायी अवस्था नहीं बल्कि एक अस्थायी संक्रमण था।
वैश्विक आर्थिक आँकड़े इस परिवर्तन को ठोस रूप से सिद्ध करते हैं। वर्ष 2000 के आसपास विश्व सकल घरेलू उत्पाद में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई थी, जबकि 2020 के दशक में यह घटकर लगभग एक-चौथाई रह गई। इसी अवधि में चीन की हिस्सेदारी कई गुना बढ़ी और वह विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल हो गया। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के आकलन बताते हैं कि क्रय-शक्ति समानता के आधार पर उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अब वैश्विक उत्पादन का बहुमत हिस्सा उत्पन्न कर रही हैं। इसका अर्थ यह है कि आर्थिक शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे पश्चिम से हटकर व्यापक वैश्विक दक्षिण और एशियाई क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो रहा है। जब आर्थिक संतुलन बदलता है तो राजनीतिक प्रभाव भी उसी दिशा में पुनर्संतुलित होता है; इसलिए किसी भी राष्ट्र द्वारा पुराने प्रभुत्व को बनाए रखने का प्रयास वास्तविकताओं से आँख मूँदने जैसा है।
सैन्य हस्तक्षेपों का अनुभव भी यह दिखाता है कि बलपूर्वक प्रभुत्व स्थापित करने की नीति अंततः उलटी पड़ती है। इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के नाम पर शुरू हुए अभियानों ने आरंभ में शक्ति प्रदर्शन अवश्य किया, किंतु दीर्घकाल में उन्होंने अस्थिरता, भारी आर्थिक व्यय और मानवीय क्षति ही उत्पन्न की। दशकों तक चले अभियानों पर खरबों डॉलर खर्च हुए, हजारों सैनिकों और असंख्य नागरिकों की जान गई, और अंततः राजनीतिक परिणाम वही रहे जिन्हें रोकने के लिए युद्ध प्रारंभ किया गया था। यह उदाहरण बताता है कि किसी भी देश की सैन्य क्षमता चाहे कितनी ही विशाल क्यों न हो, वह जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं को बलपूर्वक परिवर्तित नहीं कर सकती।
इसी प्रकार 2003 का इराक युद्ध भी इस सत्य का प्रमाण है कि गलत आधार पर शुरू की गई सैन्य कार्रवाई न केवल लक्ष्य प्राप्त करने में विफल रहती है बल्कि व्यापक क्षेत्रीय अस्थिरता उत्पन्न कर देती है। इस युद्ध ने मध्य-पूर्व में शक्ति-संतुलन को बिगाड़ा, चरमपंथी संगठनों के उभार की परिस्थितियाँ तैयार कीं और वैश्विक स्तर पर अविश्वास का वातावरण बनाया। आर्थिक लागत और मानवीय क्षति इतनी अधिक रही कि उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेपवादी नीतियों के प्रति गहरा संशय पैदा कर दिया। यह अनुभव विश्व समुदाय को सिखाता है कि प्रभुत्ववादी महत्वाकांक्षा अक्सर स्वयं प्रभुत्व चाहने वाली शक्ति को ही कमजोर कर देती है।
हाल के वर्षों में यूरोप में हुआ युद्ध एक और दृष्टांत प्रस्तुत करता है। परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र द्वारा पड़ोसी देश पर आक्रमण ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियादी धारणाओं को चुनौती दी, किंतु साथ ही यह भी सिद्ध किया कि केवल सैन्य बल किसी राष्ट्र की राजनीतिक इच्छाशक्ति को समाप्त नहीं कर सकता। लंबे संघर्ष के बावजूद अपेक्षित राजनीतिक परिणाम प्राप्त न होना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आधुनिक विश्व में राष्ट्रीय पहचान, जन-समर्थन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे तत्व उतने ही निर्णायक हैं जितनी सैन्य शक्ति।
इक्कीसवीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक परिवर्तन एशिया की तीव्र आर्थिक प्रगति है। चीन का तीव्र औद्योगिक विकास, व्यापक अवसंरचना निवेश और वैश्विक व्यापार नेटवर्क ने उसे विश्व अर्थव्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा किया है। उसने समुद्री क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। किंतु साथ ही उसके आक्रामक क्षेत्रीय दावों और आर्थिक दबाव की रणनीतियों ने कई देशों को एकजुट होकर संतुलन बनाने के लिए प्रेरित किया है। इससे स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे कोई शक्ति प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करती है, वैसे-वैसे उसके विरुद्ध प्रतिरोधी गठबंधन भी मजबूत होते जाते हैं।
इस परिवर्तित वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका विशेष उल्लेखनीय है। विशाल जनसंख्या, तीव्र आर्थिक वृद्धि और सक्रिय कूटनीति के कारण वह विश्व मंच पर प्रभावशाली आवाज बनकर उभरा है। हाल के वर्षों में उसकी अर्थव्यवस्था ने कई विकसित देशों को पीछे छोड़ा है और वह वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की आकांक्षाओं को स्वर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बहुपक्षीय मंचों पर उसकी सक्रियता, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समूहों में समानांतर सहभागिता और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति यह संकेत देती है कि नई विश्व व्यवस्था में नेतृत्व का अर्थ केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं बल्कि संतुलन-निर्माण और संवाद-सृजन भी है।
बहुपक्षीय संस्थाओं की संरचना भी परिवर्तन की मांग कर रही है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्मित संस्थागत ढाँचा उस समय की शक्ति-संतुलन की वास्तविकताओं को दर्शाता था, किंतु आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं में स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार की व्यवस्था कई बार निर्णय-प्रक्रिया को बाधित कर देती है, विशेषकर तब जब विवाद स्वयं शक्तिशाली देशों से संबंधित हो। इसलिए एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग लगातार बढ़ रही है, ताकि वैश्विक शासन संरचना वर्तमान वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित कर सके।
तकनीकी क्षेत्र आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा का नया रणक्षेत्र बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और जैव-प्रौद्योगिकी जैसी उन्नत तकनीकें भविष्य की आर्थिक तथा सैन्य शक्ति को निर्धारित करेंगी। कुछ देशों द्वारा उन्नत तकनीक के निर्यात पर प्रतिबंध या आपूर्ति-श्रृंखलाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिशें अल्पकालिक रणनीतिक लाभ दे सकती हैं, परंतु दीर्घकाल में वे तकनीकी आत्मनिर्भरता की प्रतिस्पर्धा को और तेज कर देती हैं तथा वैश्विक सहयोग को कमजोर करती हैं। आधुनिक विश्व की परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था में तकनीकी अवरोध अंततः सभी देशों को प्रभावित करते हैं।
जलवायु परिवर्तन का संकट तो और भी स्पष्ट रूप से दिखाता है कि प्रभुत्ववादी सोच वैश्विक समस्याओं का समाधान नहीं दे सकती। वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि औद्योगिक युग के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और यदि उत्सर्जन में तीव्र कमी नहीं हुई तो यह वृद्धि 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर सकती है। यह संकट किसी एक देश की सीमाओं में सीमित नहीं रहता; इसके प्रभाव पूरी मानवता को प्रभावित करते हैं। फिर भी प्रमुख उत्सर्जक देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और अविश्वास ने लंबे समय तक सामूहिक कार्रवाई को धीमा रखा। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक चुनौतियाँ सहयोग से ही सुलझ सकती हैं, प्रतिस्पर्धी प्रभुत्व से नहीं।
आर्थिक व्यवस्था में भी वैकल्पिक संस्थाओं का उदय हो रहा है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने अपने विकास वित्तपोषण और निवेश के लिए नए बैंक तथा भुगतान तंत्र स्थापित किए हैं, ताकि वे पारंपरिक वित्तीय ढाँचों पर निर्भर न रहें। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वित्तीय नियंत्रणों के अनुभव ने कई देशों को यह सोचने पर विवश किया है कि आर्थिक संप्रभुता बनाए रखने के लिए विविध विकल्प आवश्यक हैं। परिणामस्वरूप वैश्विक वित्तीय प्रणाली अधिक बहुकेंद्रीय होती जा रही है।
वैश्विक दक्षिण के देशों की आकांक्षाएँ भी अब अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ रही हैं। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देश लंबे समय तक विश्व व्यवस्था के निर्माण में हाशिये पर रहे, जबकि उन्हें महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा की कीमत चुकानी पड़ी। आज वे अधिक समान भागीदारी, न्यायपूर्ण व्यापार और संसाधनों के उचित मूल्य की मांग कर रहे हैं। विशेष रूप से अफ्रीका, जिसकी जनसंख्या आने वाले दशकों में अत्यंत तीव्र गति से बढ़ने वाली है और जिसके पास ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक खनिज संसाधनों का विशाल भंडार है, भविष्य की विश्व अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सकता है—यदि उसे समान अवसर और साझेदारी मिले।
इन सभी प्रवृत्तियों का समेकित निष्कर्ष यह है कि इक्कीसवीं सदी की विश्व व्यवस्था स्वाभाविक रूप से बहुध्रुवीय बन रही है। तकनीकी प्रसार, जनसांख्यिकीय परिवर्तन, आर्थिक पुनर्संतुलन और वैश्विक समस्याओं की साझा प्रकृति ऐसी शक्तियाँ हैं जिन्हें कोई भी राष्ट्र अकेले नियंत्रित नहीं कर सकता। इसलिए भविष्य उन्हीं देशों का होगा जो सहयोग, संवाद और समावेशी संस्थाओं के निर्माण को प्राथमिकता देंगे। शक्ति का वास्तविक अर्थ दूसरों को झुकाने की क्षमता नहीं बल्कि उन्हें साथ लेकर चलने की योग्यता होगा।
यदि विश्व शक्तियाँ प्रभुत्व की पुरानी मानसिकता से चिपकी रहीं, तो प्रतिस्पर्धा छोटे देशों की स्थिरता, वैश्विक अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। किंतु यदि वे यह समझ लें कि आधुनिक युग में स्थायी नेतृत्व केवल साझेदारी और विश्वास से ही संभव है, तो एक अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण संभव है। इतिहास का रुझान भी यही संकेत देता है कि अंततः वही राष्ट्र सफल होते हैं जो दूसरों की संप्रभुता का सम्मान करते हैं और साझा भविष्य के निर्माण में सहयोगी भूमिका निभाते हैं।
इस प्रकार इक्कीसवीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि अब विश्व इतना परस्पर जुड़ा, जागरूक और संतुलित हो चुका है कि कोई भी एक राष्ट्र लंबे समय तक सम्पूर्ण प्रभुत्व कायम नहीं रख सकता। आने वाला युग प्रतिस्पर्धी वर्चस्व का नहीं बल्कि सहकारी नेतृत्व का होगा—और यही मानव सभ्यता के स्थायी तथा शांतिपूर्ण भविष्य की वास्तविक आधारशिला है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
