गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

देख तुमसे हमें तो गिला ही नहीं।
आज ऐसा अभी तक मिला ही नहीं।।

देहरी आज सूनी रही देख लो।
एक भी दीप अब तक जला ही नहीं।।

रंग खेले नहीं सोच लो आज भी।
एक साथी अभी तक दिखा ही नहीं।।

खूबियाँ ही रहे देखते आज तक।
दे सके अब तलक हम सिला ही नहीं।।

खूबसूरत लगे ही हमेशा रहे।
रंग कोई उन्हीं पर खिला ही नहीं।।

ज़िंदगी क्या उसी की रही आज तक।
प्यार के रंग में जो रंगा ही नहीं।।

रंग मैला न हो बस यही सोच कर।
देख चिलमन उसी का हटा ही नहीं।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’