ढलती शाम
ढलती शाम देती ये पैगाम,
ख्वाहिशों को मिला विराम।
फिर नई इक भोर आएगी,
ख्वाबों को पंख दे जाएगी।
धरा और दूर वो आकाश,
मिले न मिलें पर है आस।
हर आगाज़ का अंत होता,
जन्म लेता वो खत्म होता।
बचपन,जवानी या बुढ़ापा
चमके सूरज फिर चंद्र आता।
समय बदलता,मौसम बदलें,
बदलाव प्रकृति है समझ लें।
हर रंग,रुप और हाल में जीएं,
कभी खुशी कभी ग़म भी पीएं।
सुबह के बाद शाम भी आएगी,
उम्र का कोई पड़ाव न दोहराएगी।
— कामनी गुप्ता
