मानवता का गीत
मैं मानव हूं
और कुछ नहीं, सच में
धूप की तरह
साँसों में बसी
अनगिनत कहानियाँ
मौन के बीच
पगडंडी पर
पत्थर भी मुस्कुराते
चलते कदमों में
आसमान देखूं
नभ की विशाल छाया
मेरे भीतर भी
पानी की धारा
छू ले जब मेरी रगों को
जीवन मुस्काए
पत्तों की सरसराहट
हवा से बातें करती
मुझे याद दिलाए
चाँद की रोशनी
सुरंगों में घुलती है
अँधेरा भी साथ
सफलता या हार
सब क्षण हैं क्षणिक
मैं केवल मानव
हँसी और आँसू
संगीत बनकर बहते
अंतरतम में
समय की धारा
सपनों को बहा ले जाए
पर मैं ठहरा
अजनबी राहें
मुझे मेरा परिचय दें
मैं मानव हूं
सपनों की गूँज
मन के भीतर गहराई
अनंत यात्रा
धरती की खुशबू
सांसों में मिलकर बोले
जड़ता भी जीवन
आँखों में चमक
अनकहे सवालों की
गूँज है मेरी
शब्द बनकर भी
कुछ कह न पाएं कभी
मैं मानव हूं
साँझ की धूप
धीरे-धीरे ढलती है
मन स्थिर रहे
रात की शांति
हर विचार को पाले
स्वप्न सजाए
मैं मानव हूं
और कुछ नहीं, बस इतना
जीवन का पाठ
संगीत की तरह
हर धड़कन एक राग है
अनंत तक चल
पर्वतों की चोट
हवा से बातें करती
शांति का स्वर
सागर की लहर
मेरे भीतर उथल-पुथल
शांति भी मिले
प्रकृति के गीत
हर पत्ते में झलकें
मैं मानव हूं
मन की गहराई
अनंत विचारों का घर
खोज जारी रहे
— डॉ. अशोक
