जीवंत तस्वीर
मुश्ताक़ को अपना बचपन याद आया वो दिन जब कंधों पर स्कूल का भारी बस्ता होता था, न कि ज़िम्मेदारियों का पहाड़। फ़ोटोग्राफ़ी उनका जुनून था। पुराने दोस्त अशोक के साथ मिलकर उसने एक पुराना, कैमरा खरीदा था। दोनों गांव की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों, ढलते सूरज की लालिमा और नदी किनारे खिलते कमल की तस्वीरें लिया करते। अशोक हँसते हुए कहता, “मुश्ताक़, तू एक दिन दुनिया का मशहूर आर्टिस्ट बनेगा! तेरी लेंस से वो नज़ारे कैद होंगे जो आँखें भी न देख सकें।” लेकिन वालिद साहब की थकान, उम्र और घर की माली हालत ने उस कैमरे को अलमारी के धूल भरे कोने में दफ़ना दिया। आज भी, जब मुश्ताक़ किसी युवा को कैमरा लिए सड़क पर देखते, तो दिल में एक गहरी टीस उठती,वो कलाकार मुश्ताक़ कहीं खो गया था, बचा था तो सिर्फ़ एक साधारण क्लर्क, ज़रूरतों का ग़ुलाम।सलमा की ममता का आलम ख़यालों की इस मशगूल दुनिया से उन्हें पत्नी सलमा की मधुर आवाज़ ने ,अपनी तरफ़ मुतवज्जो किया। “मुश्ताक़ साहब, चाय ठंडी हो रही है। आँखें बंद करके क्या ख़्वाब बुन रहे हो?” मुश्ताक़ ने आँखें खोलीं। सामने सलमा खड़ी थीं,उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक, लेकिन वक़्त की चक्की ने झुर्रियाँ उकेर दी थीं। बालों पर कुछ चांदी सी चमक नज़र आने लगी थी, शादी के वक़्त सलमा का चेहरा खिले गुलाब सा हुआ करता था, घने काले बाल और लाली भरी हँसी। देखते ही बनती थी,अब हाथ सख़्त हो चुके थे घर की मेहनत से, लेकिन आँखों में वही वफ़ा झलक रही थी।
मुश्ताक़ ने उनका हाथ थामा, आवाज़ में उदासी घुली हुई, “सलमा, तुम भी कितना थक गई हो। बच्चों की परवरिश, माँ-बाप की ख़िदमात में,तुमने कभी अपना हक़ से कुछ नहीं माँगा।” सलमा मुस्कुराईं, आँखें नम हो गईं “अरे जनाब, थकान क्या चीज़ है? जब तक आपकी नज़रों में परिवार की फ़िक्र है, मेरी रूह में सुकून बस्ता है। हम एक कश्ती के साथी हैं,आप लड़खड़ाओगे तो मैं संभालूँगी, मैं थकूँगी तो आपका ये प्यार मेरा सहारा बनेगा।” सलमा ने मुश्ताक़ का हाथ छुआ, तो बरसों की थकान हवा में उड़ गई। मुश्ताक़ बोले, “सच कहती हो। मेरे फ़ोटोग्राफ़ी के सपने अधूरे रह गए, लेकिन तुम और बच्चे मेरी ज़िंदगी की सबसे जीवंत तस्वीर बन गए हो ।” रात की ख़ामोशी में उन्हें एहसास हुआ,ज़िम्मेदारियाँ बोझ नहीं, बल्कि प्यार का वो सबूत हैं जो दिल को अमर बनाते हैं।परिवार का सुकून भरा माहौल था, वे दोनों आंगन से कमरे में पहुँचे, जहाँ उनका बेटा समीर और उनका पोता रमीज़ अपनी छोटी सी बाइक चलने में मशगूल था, दौड़ कर मुश्ताक की गोदी में आकर बैठ गया,मानो सारी दुनिया की दौलत उसको मिल गई थी, वो बड़ा पुरसुकून सा अपने दादा की गोद में बैठा मुस्कुरा रहा था,कल ही सलमा शहर से अपने पोते के लिए बाइक खरीद कर लाई थी, मुश्ताक़ अहमद के चेहरे से थकान ग़ायब हो चुकी थी। उन्होंने बेटी को पुकारा, “बेटा, आओ तुम भी। दादा-दादी ने खाना खा लिया?” बेटी की आवाज़ आई, “जी पापा, वो पहले ही खा चुके हैं। दवाईयाँ भी ले लीं। सब ठीक है।” सभी एक मेज़ पर बैठे। हँसी-मज़ाक़ का दौर चला, बेटे ने नई नौकरी की बात बताई, बहू अमरीन ने घर की नई रेसिपी आज़मा कर कुछ नया बनाया था ,माहौल में सुकून की लहर दौड़ रही थी, जैसे चाँदनी रात ने सबको गोद में ले लिया हो। मुश्ताक़ सोच रहे थे, कल सुबह फ़िर नया सूरज उगेगा, और वे इस परिवार की खुशियों के लिए तैयार होंगे,सपनों की कमी तो थी, लेकिन प्यार की कोई कमी न थी।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
