चलो बहाना खोजते हैं
बैठे बैठे हम यूं ही सबको कोसते हैं,
चलो कुछ न करने का बहाना खोजते हैं,
अपने मन को अपनों के लिए
हम क्यों नहीं खींचते हैं,
जैसे प्यार से अपने खेतों में पानी सींचते हैं,
आओ विचारों पर चलना सीखें,
औरों संग खुद भी संभलना सीखें,
क्या हम अपना गौरवशाली इतिहास
लोगों को बता नहीं सकते,
हताशा को दूर रख
एक छत के नीचे आ नहीं सकते,
जब जरूरत हो तब
साथ न चलने का फसाना खोजते हैं,
चलो कुछ न करने का बहाना खोजते हैं,
हम भूल जा रहे हैं कि
विरोधी कदम दर कदम तैयारी कर रहे हैं,
छलने को हमें अय्यारी कर रहे हैं,
हम मस्त हो हर नशे में डूबे जा रहे हैं,
भांग गांजा शराब और
चमत्कारिक प्रसाद खा रहे हैं,
झूठ मूठ किसी और के गीत गाये जा रहे हैं,
मानसिक दिवालिया हो अपना सर्वस्व लुटा रहे हैं,
बहाने भी इतने अच्छे कि
समाज को लौटाने में टालमटोल कर रहे हैं,
दे सकते हैं चंद कलम किसी जरूरतदार को
पाखंडों को अपना मस्तिष्क में
पेट्रोल संग चिंगारी धर रहे हैं,
अच्छा हुआ कि बुद्ध ने,
ज्योतिबा,रैदास,कबीर और भीम जैसे प्रबुद्ध ने,
पेरियार, ललई, जगदेव बाबू, छोटूराम ने,
राजनीतिक चेतना जागृत करने वाले
मान्यवर कांशीराम ने,
यदि कुछ न कर बहाने खोजे होते,
तो पड़े रहते अपनी किस्मत पर रोते,
कुछ न कर अपनों को नोचते हैं,
अब भी कह रहे चलो बहाना खोजते हैं।
— राजेन्द्र लाहिरी
