युद्ध का सबसे गहरा जख्म : ईरान में महिलाएँ, बच्चे और आम नागरिक
युद्ध के बारे में अखबारों में सैन्य लक्ष्यों, मिसाइलों की संख्या और नेतृत्व की मौतों की खबरें आती हैं। लेकिन युद्ध की सबसे गहरी, सबसे स्थायी और सबसे अनदेखी कीमत वे लोग चुकाते हैं जिन्होंने न बम बनाया, न नीति तय की, न युद्ध चाहा — वे हैं आम नागरिक, महिलाएँ और बच्चे। 16 मार्च 2026 को जब ईरान युद्ध 16वें दिन में है, तब संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों के जो आँकड़े सामने आए हैं वे इस जंग का वह चेहरा दिखाते हैं जिसे न व्हाइट हाउस की प्रेस ब्रीफिंग में जगह मिलती है और न IDF की मीडिया रिलीज में। Wikipedia के 2026 ईरान युद्ध पृष्ठ के अनुसार इस युद्ध में ईरान में 3.2 मिलियन यानी 32 लाख से अधिक लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। 7 मार्च तक 6,668 से अधिक नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाया जा चुका था। ईरान के रेड क्रेसेंट के अनुसार इन हमलों में अस्पताल, स्कूल और आवासीय इमारतें शामिल थीं। 1,348 से अधिक ईरानी नागरिक मारे जा चुके हैं और 17,000 से अधिक घायल हैं।
इन आँकड़ों में एक खास घटना है जो मानवता को अंदर से हिला देती है — होर्मोजगान प्रांत के मिनाब में एक लड़कियों के स्कूल पर हुए हमले में 160 से अधिक छात्राएँ मारी गईं। एक स्कूल पर बम। इस एक वाक्य में वह सब कुछ समाया हुआ है जो युद्ध के बारे में जानने की जरूरत है। इन बच्चियों का न कोई राजनीतिक एजेंडा था, न परमाणु कार्यक्रम से कोई संबंध, न IRGC से — वे बस अपने भविष्य के सपने देख रही थीं। UN के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस हमले की कड़ी निंदा की लेकिन जिम्मेदारी किसकी थी — अमेरिका-इजराईल के प्रवक्ताओं ने इसे ‘जाँच के अधीन’ बताया। लेबनान में इजराईली हमलों में 2 मार्च से 826 लोग मारे जा चुके हैं जिनमें कम से कम 98 बच्चे हैं। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार लेबनान के दक्षिणी कंतारा में एक पूरे परिवार को — जिसमें दो बच्चे थे — इजराईली हमले में मार दिया गया।
ईरान में युद्ध से पहले ही महिलाओं और नागरिक समाज की स्थिति बेहद कठिन थी। Wikipedia के अनुसार जनवरी 2026 में ईरानी सुरक्षा बलों ने देश भर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान व्यापक दमन किया — हजारों की गिरफ्तारी, प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और अभिव्यक्ति, सभा और सूचना की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध। ये वही विरोध थे जो जनवरी 2026 में इस्लामिक क्रांति के बाद की सबसे बड़ी रैलियाँ थीं और जिनके जवाब में सरकार ने सैकड़ों लोगों को मार डाला था। राष्ट्रपति ट्रम्प ने उन हत्याओं के बाद सैन्य कार्रवाई की धमकी दी थी। अब जब युद्ध छिड़ गया है, उन्हीं महिला प्रदर्शनकारियों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की स्थिति और भी जटिल हो गई है — एक तरफ सरकारी दमन, दूसरी तरफ अमेरिकी-इजराईली बमबारी। उनके लिए न ‘हमारी सरकार’ से सुरक्षा है, न ‘आक्रमणकारियों’ से।
Iran International ने एक मार्मिक रिपोर्ट में ईरानी नागरिकों के वीडियो संकलित किए जो युद्ध से पहले की महंगाई, प्रतिबंधों और अब युद्ध की दोहरी मार झेल रहे हैं। एक व्यक्ति का वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह कहता है — ’16 मिलियन रियाल में चार फल खरीदे। जितना सरकार के लोग बर्दाश्त करते हैं, आप उतने ही बुरे होते जाते हैं।’ एक और व्यक्ति दिखाता है कि 30 अंडों की कीमत 1,980,000 रियाल हो गई जो पहले 1,300,000 थी। तारीखों के बारे में एक व्यंग्यात्मक वीडियो में कोई कहता है — ‘700 ग्राम ‘पैगंबर और इमामों का भोजन’ अब 3,760,000 रियाल का हो गया।’ ईरान की न्यूनतम मजदूरी 104 मिलियन रियाल प्रति माह यानी लगभग 94 डॉलर है। इस न्यूनतम मजदूरी पर जीने वाले परिवार के लिए युद्ध से पहले ही जीना मुश्किल था, अब लगभग असंभव है।
UNHCR के अनुसार ईरान में 32 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। यह भारत के किसी बड़े राज्य की आबादी के बराबर है। ये वे लोग हैं जो अपने घर, अपनी दुकानें, अपनी पढ़ाई, अपना इलाज — सब छोड़कर अनिश्चित भविष्य में निकल पड़े हैं। लेबनान में 800,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। देश में नागरिक बुनियादी ढाँचे का भारी नुकसान हुआ है जिनमें 2 मार्च को हुए हवाई हमले में बेरूत के दाहियेह इलाके में पूरी इमारतें ढह गईं। ईरान में WHO ने तेहरान के तेल सुविधाओं पर हमले से निकले काले धुएं को ‘जहरीला’ घोषित किया है। यह प्रदूषण सबसे पहले उन गरीब और मध्यवर्गीय इलाकों के लोगों को नुकसान पहुँचाएगा जिनके घर इन कारखानों के करीब हैं, और जिनके पास न शहर छोड़ने का संसाधन है, न महंगे इलाज का।
इस युद्ध के मानवीय संकट की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वे लोग जो सबसे अधिक पीड़ित हैं — ईरान की आम महिलाएँ, बच्चे, गरीब मजदूर, छात्राएँ — न ईरानी सरकार की नीतियों के समर्थक हैं, न परमाणु हथियार की माँग करने वाले। जनवरी 2026 में उन्होंने सड़कों पर उतरकर अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाई थी। लेकिन अब एक बाहरी हमले ने उन्हें उस सरकार की ‘रक्षा’ के लिए एकजुट होने को मजबूर कर दिया है — यह वही ‘रैली अराउंड द फ्लैग’ परिघटना है जो हर बड़े युद्ध में होती है। इतिहास गवाह है कि जब बाहरी दुश्मन हमला करता है तो आंतरिक असंतोष अस्थायी रूप से दब जाता है। इस युद्ध ने ईरान की आंतरिक परिवर्तन की संभावना को — जो जनवरी 2026 के विरोधों में नजर आ रही थी — कम से कम कुछ वर्षों के लिए पीछे धकेल दिया। यह एक और तरह की क्षति है जो किसी भी बम के नक्शे में दर्ज नहीं होती लेकिन इतिहास में सबसे गहरे और स्थायी निशान छोड़ती है।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
