संयम, संकल्प और निरंतरता ही वे चाबियाँ हैं जो प्रगति के द्वार खोलती हैं
जीवन में अनुशासन और समय का महत्व एक ऐसा विषय है जिस पर जितना विचार किया जाए उतना कम है क्योंकि सफ़लता की नींव इन्हीं दो स्तंभों पर टिकी होती है और जो व्यक्ति समय की क़द्र नहीं करता समय उसे पीछे छोड़ देता है, जबकि अनुशासन हमें वह शक्ति प्रदान करता है जिससे हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास कर सकते हैं। असल में प्रकृति भी हमें निरंतर यही सिखाती है कि हर कार्य का एक निश्चित समय होता है जैसे सूर्य का उदय होना और ऋतुओं का बदलना हमें यह संदेश देता है कि व्यवस्था ही ब्रह्मांड का नियम है और जब हम अपने जीवन में इस नियम को उतारते हैं तो हमारी कार्यक्षमता कई गुना बढ़ जाती है। अक्सर लोग सोचते हैं कि अनुशासन का अर्थ केवल कड़े नियमों का पालन करना है लेकिन वास्तविकता यह है कि अनुशासन हमें वह स्वतंत्रता देता है जिससे हम अपने मन के भटकाव को रोककर अपनी ऊर्जा को सही दिशा में प्रवाहित कर सकें क्योंकि बिना उद्देश्य के मेहनत केवल थकान लाती है जबकि अनुशासित मेहनत परिणाम लाती है। वर्तमान समय में तकनीक और विलासिता के साधनों ने हमें थोड़ा आलसी बना दिया है जिससे हम अक्सर कार्यों को कल पर टालने की प्रवृत्ति विकसित कर लेते हैं परंतु यह समझना आवश्यक है कि बीता हुआ पल कभी वापस नहीं आता और यही वह क्षण है जिसे हम बेहतर बना सकते हैं। एक विद्यार्थी के जीवन में तो अनुशासन का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि यही वह समय होता है जब चरित्र का निर्माण होता है, और अच्छी आदतें भविष्य की सफ़लता का मार्ग प्रशस्त करती हैं। अंततः यह कहा जा सकता है कि संयम, संकल्प और निरंतरता ही वे चाबियाँ हैं जो प्रगति के द्वार खोलती हैं और जो व्यक्ति अपनी आदतों पर विजय पा लेता है वह पूरी दुनिया पर विजय पाने की क्षमता रखता है, क्योंकि स्वयं पर नियंत्रण ही सबसे बड़ी जीत है और यही जीवन का असली सार है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
