जड़ी-बूटियां स्वरोजगार एवं स्वास्थ्य हेतु उपयोगी
जड़ी-बूटियां बनी आधार..मिल रहा स्वरोजगार ।सतपुड़ा के घने जंगल पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां से आर्युवेद ओर परंपरागत चिकित्सा सेवा देने के प्रयास सराहनीय है।इसकी पैथी ओर इसके वैध जानकारों को शासन-प्रशासन ने संरक्षण और पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता का दर्जा। देकर इनकी सेवा भी ली जा रही है।प्रधानमंत्री मोदीजी द्वारा भारतीय पुरातन पारंपरिक किये जाने की दिशा में दूरस्थग्रामीण अंचलों में जड़ी-बूटी संजीवनी के जानकारों एवं उपयोगकर्ताओं को इसका लाभ स्वरोजगार के रूप में अवश्य प्राप्त होगा।कई स्थानों पर आदिवासी महिलाओं द्धारा बनाए गए उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए घरेलू नुस्खों से ही औषधि बनाने के लिए जगलों की जड़ी बूटियों से कारोबार कर अपनी आय में बढ़ोतरी कर रही है।महिला समूह की इकाई का कार्य प्रशंसनीय है।आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों अपने पूर्वजों के ज्ञान से पीढ़ी दर पीढ़ी जड़ी बूटियों की पहचान कर छोटी मोटी बीमारियों का इलाज जड़ी बूटियों कीऔषधि बनाकर करते आए है।आयुर्वेदिक दवाइयों में इनके उपयोग किए नुस्खों का रूप को देखने को मिलता है।ये इंसान के अलावा पशु पक्षियों का भी जड़ी बूटियों से इलाज करते आ रहे है। वन आर्थिक सुधारने को जरुरी है कि ग्रामीण समुदाय वनों के मालिक बने | ऐप बनकर मोबाइल पर उपलब्ध करवाया जाना चाहिए| महिलाओं को प्रशिक्षण,मार्केटिंग , सरकार से ऋण दिलवाकर जंगल से रोजगार उपलब्धि का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिये| जिससे वनोपज की बड़ी कंपनियों से सही कीमत प्राप्त हो सकें ।
— संजय वर्मा “दृष्टि”
