मां नवदुर्गा के नौ स्वरूपों पर विशेष रचना
प्रथम स्वरूप शैलपुत्री
हे गिरिजा, हिमशिखर-विहारिणी, वृषारूढ़ा भव-तारिणी,
त्रिशूल-दीप्त कर-कमल, करुणा-सिन्धु, मंगल-कारिणी।
प्रथम प्रभा-सी तुम प्रकटो, जग में चेतन ज्योति जलाओ,
भक्ति-सरित बहा हृदय में, जीवन-पथ शुभमय बनाओ।
द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी
नंगे पाँव तप की राह चली, दीप-सा धीर उजाला,
जप की माला, मन में व्रत, दृढ़ता का निर्मल प्याला।
तुमसे सीखें धैर्य धरा, संकल्पों की ज्योति जलाएँ,
कठिन दिनों की धूप में भी, विश्वास-फूल खिलाएँ।
तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा
रण-घोष-सी घंटा ध्वनि, नभ में गूँजे गर्जन भारी,
सिंह-विहग-सी दौड़ी माता, दुष्ट-दलन की तैयारी।
चंद्र-किरण सा शीतल मुख, पर क्रोध अग्नि-सी ज्वाला,
शौर्य-शक्ति की ज्योति बनो, हर लो भय का काला।
चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा
मंद हास से रच दिया तुमने, नभ का विस्तृत आँगन,
दीप-दीप से जगमग करती, सृष्टि बनी तुम्हारा दर्पण।
अंडज ब्रह्म का अंकुर फूटा, प्रकाश तुम्हारा गाया,
अंधकार की देह पिघलकर, सूरज बन मुस्काया।
पंचम स्वरूप स्कंदमाता
गोद में बाल स्कंद लिए, मुस्काती शीतल छाया,
ममता की धारा बहती, जग ने सुख का स्वर पाया।
सिंह सवारी, हृदय करुणा, वात्सल्य का उजियारा,
माँ तुमसे ही सुरक्षित लगता, जीवन का हर किनारा।
षष्ठम स्वरूप कात्यायनी
कात्यायनी मैया आयी, लियो सिंह पर सवार,
भय भागे सब दानव दल, भयो जगत उजियार।
कनक-कांति तन दमक्यो, कर में खड्ग सुहाय,
भक्तन की अरज सुनत ही, संकट दूर भगाय।
सप्तम स्वरूप कालरात्रि
अंधकार का आवरण ओढ़े, तुम ज्योति का सत्य दिखाओ,
भय के पार खड़ी तुम माता, मृत्यु में जीवन समझाओ।
काली छाया में भी छिपा है, आशा का स्वर्णिम तारा,
विनाश से ही जन्मे नव-सृजन, यह संदेश तुम्हारा।
अष्टम स्वरूप महागौरी
चाँदनी-सी धवल कांति, गंगा-जल-सी निर्मल,
श्वेत वसन में शांति बसी, मन हो जाता निष्कल।
करुणा की शीतल वर्षा से, पाप धुलें सब भारी,
माँ महागौरी चरणों में, जीवन बने उजियारी।
नवम स्वरूप सिद्धिदात्री
कमलासन पर विराजी , वरदानी कर फैला,
सिद्धि-सुधा बरसाती मां , मिटा अज्ञान का मेला।
भक्त हृदय में दीप जलाओ, ज्ञान सुधा बरसाओ,
नवमी की पूर्णिमा बनकर, जीवन सफल बनाओ।
— गोपाल कौशल भोजवाल
