कविता

जगह का मेल

उनका जहां गत बरस
हो चुका था बरबाद,

साल भर बीता—
मिट्टी में मिलने को भी
न मिला कोई ठिकाना याद।

ताउम्र जिसे था घमंड
अपने भरे-पूरे संसार का,
रिश्तों की भीड़ में डूबा
अहंकार अपार का।

समाज की ओर कभी
हंसकर बढ़ा नहीं हाथ,
अपनों में चेतना जगाने का
न चुना कोई पथ, न साथ।

जब भी कोई आया
सहयोग की विनती लेकर,
ठुकरा दिया उसे
नया धंधा कहकर।

आरक्षण की सीढ़ियों से
चढ़ता रहा ऊँचाई,
पर लौटाकर समाज को
कभी न दी भरपाई।

अपने लिए ही जिया—
उलझे, अधूरे सपनों में,
भूल गया चलना
महापुरुषों के पदचिन्हों में।

तिलक, जगराते, चंदे में
ढूंढ़ता रहा पहचान,
ज्ञान था अक्षरों का,
पर नहीं था समाज का ज्ञान।

स्वयं को मानता रहा
बड़ा विद्वान,
पर समय ने अंततः
खोल दिया उसका अभिमान।

आज देखो विडंबना का खेल—
रिश्तों की भीड़ में भी
न मिला उसे
अपनी मिट्टी का मेल।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554