नीतिगत लापरवाही से गहराता एलपीजी संकट
भारत आज एक ऐसे ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा है, जिसकी आहट लंबे समय से सुनाई दे रही थी, लेकिन नीतिगत सुस्ती और दूरदृष्टि के अभाव ने इसे एक वास्तविक खतरे में बदल दिया है। एलपीजी (रसोई गैस) की कमी केवल एक आपूर्ति समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे ऊर्जा प्रबंधन, आयात-निर्भरता और भंडारण क्षमता की गहरी खामियों का आईना है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश में एलपीजी की खपत में जबरदस्त वृद्धि हुई है, विशेषकर ग्रामीण और गरीब तबकों में, जहां स्वच्छ ईंधन की पहुंच बढ़ाने के लिए सरकारी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन इस सफलता के साथ समानांतर बुनियादी ढांचे का विकास नहीं हुआ, जिसके कारण आज मांग और आपूर्ति के बीच खतरनाक असंतुलन पैदा हो गया है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत की कुल एलपीजी खपत का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है और इनमें से लगभग 85 प्रतिशत आयात होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है। यह वही क्षेत्र है जो आज भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में किसी भी तरह की सैन्य या राजनीतिक हलचल सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। वैश्विक संघर्षों का स्थानीय रसोई तक असर पहुंचना इस बात का संकेत है कि हमने अपनी ऊर्जा रणनीति को अत्यधिक बाहरी कारकों के भरोसे छोड़ दिया है। यह निर्भरता केवल आर्थिक जोखिम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुकी है।
और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत के पास एलपीजी का भूमिगत भंडारण अत्यंत सीमित है, जो कुल मिलाकर केवल लगभग 1.4 लाख टन है—यह देश की दो दिन की खपत से भी कम है। एक ऐसे देश के लिए, जहां मासिक खपत लगभग 30 लाख टन के आसपास है, यह स्थिति किसी भी आपातकालीन परिस्थिति में पूरी तरह असहाय बना सकती है। इसके विपरीत, कच्चे तेल के मामले में भारत ने रणनीतिक भंडार विकसित किए हैं, जो लगभग दो महीने की खपत को संभाल सकते हैं। सवाल यह उठता है कि जब तेल के लिए यह दूरदर्शिता दिखाई गई, तो एलपीजी जैसे आवश्यक घरेलू ईंधन के लिए क्यों नहीं?
नीतिगत असंतुलन की एक और परत उजागर होती है जब हम यह देखते हैं कि एलपीजी वितरण प्रणाली को ‘ऑपरेशनल फ्लो’ के आधार पर डिजाइन किया गया है, न कि दीर्घकालिक भंडारण को ध्यान में रखते हुए। यानी जैसे ही आपूर्ति में हल्की सी भी बाधा आती है, इसका सीधा असर बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ता है। यह मॉडल एक स्थिर और सुरक्षित वैश्विक वातावरण में तो काम कर सकता है, लेकिन आज के अनिश्चित भू-राजनीतिक परिदृश्य में यह पूरी तरह अप्रासंगिक और जोखिमपूर्ण साबित हो रहा है।
सरकार द्वारा चलाई गई उज्ज्वला योजना जैसे कार्यक्रमों ने निश्चित रूप से सामाजिक दृष्टि से सकारात्मक परिवर्तन लाया है। करोड़ों परिवारों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। लेकिन इस योजना ने मांग को तेजी से बढ़ाया, जबकि आपूर्ति और भंडारण के बुनियादी ढांचे में समान गति से निवेश नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, आज हम एक ऐसी स्थिति में हैं जहां मांग को पूरा करने के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ गई है, और घरेलू स्तर पर कोई ठोस सुरक्षा कवच मौजूद नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने पहले ही भारत में गैस भंडारण की कमी को एक संरचनात्मक कमजोरी बताया था, लेकिन इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। यूरोप जैसे क्षेत्र, जहां प्राकृतिक गैस की खपत अधिक है, वहां 25 प्रतिशत तक वार्षिक खपत का भंडारण संभव है। इसके विपरीत भारत का आंकड़ा नगण्य है। यह तुलना केवल आंकड़ों का अंतर नहीं दिखाती, बल्कि नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं में अंतर को भी उजागर करती है।
समाधान की दिशा में सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है दीर्घकालिक रणनीतिक भंडारण का विकास। भारत के पास भौगोलिक रूप से ऐसे क्षेत्र मौजूद हैं जहां भूमिगत गैस भंडारण संभव है, जैसे प्रायद्वीपीय शील्ड क्षेत्र और राजस्थान के नमक भंडार। इन स्थानों पर आधुनिक तकनीक के माध्यम से बड़े पैमाने पर एलपीजी कैवर्न बनाए जा सकते हैं, जो आपातकालीन परिस्थितियों में आपूर्ति को स्थिर बनाए रखेंगे। इसके साथ ही, निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है ताकि निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता दोनों का लाभ उठाया जा सके।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है आयात स्रोतों का विविधीकरण। वर्तमान में भारत का झुकाव कुछ सीमित क्षेत्रों की ओर है, जिससे जोखिम बढ़ जाता है। नए आपूर्तिकर्ताओं के साथ दीर्घकालिक समझौते, वैकल्पिक समुद्री मार्गों का विकास और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना इस दिशा में जरूरी कदम होंगे। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा और बायोगैस जैसे विकल्पों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि एलपीजी पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके।
तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू है नीति-निर्माण में दूरदर्शिता और समन्वय। ऊर्जा सुरक्षा को केवल आर्थिक मुद्दा मानने की बजाय इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में लाना होगा। विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना, डेटा-आधारित निर्णय लेना और वैश्विक परिदृश्य के अनुसार रणनीतियों को लगातार अपडेट करना समय की मांग है।
अंततः, एलपीजी संकट हमें यह सिखाता है कि केवल योजनाओं की घोषणा और अल्पकालिक उपलब्धियों से काम नहीं चलता। यदि बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक रणनीति पर समान ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसी सफलताएं ही भविष्य के संकट का कारण बन जाती हैं। भारत के पास संसाधन, तकनीक और मानव क्षमता—तीनों मौजूद हैं, जरूरत है तो केवल एक स्पष्ट दृष्टि और ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की। यदि अब भी सबक नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा हो सकता है, और इसकी कीमत देश के आम नागरिक को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में चुकानी पड़ेगी।
— अवनीश कुमार गुप्ता
