ग़ज़ल
टूट रहा है भीतर भीतर
शंकाओं में घिरा हुआ घर
फूलों को है याद अभी तक,
भँवरे का दिल तितली के पर
पपड़ाये हैं होंठ प्यास से,
उफन रहा है खारा सागर
पढ़-पढ़ मोटे पोथी पन्ने,
भूल गये सब ढाई आखर
मत फेंको औरों पर पत्थर,
रखो सम्भाले अपना भी सर
— कैलाश मनहर
