ग़ज़ल
देख समझकर भी चुप हैं,
विष को पीकर भी चुप हैं।
आँख का रोना दिखता है,
ज़ख़्म सिसककर भी चुप हैं।
बोल रहा वो मरकर भी,
हम तो जीकर भी चुप हैं।
काँटें चुभकर चिल्लाएं,
फूल महककर भी चुप हैं।
शोर मचाती हैं मंज़िल,
रस्ते चलकर भी चुप हैं।
गद्दारों का उंचा सर,
हम तो झुककर भी चुप हैं।
‘जय’ की ग़ज़लें और मुक्तक,
बज़्म में रहकर भी चुप हैं।
— जयकृष्ण चांडक ‘जय’
