नन्हा पाठक
छोटे-छोटे हाथों में,
पकड़ी एक किताब,
आँखों में है चमक भरी,
जैसे खुला हो ख्वाब।
दुकान के उस कोने में,
खड़ा हुआ वो चुपचाप,
चित्रों की दुनिया में खोकर,
करता बातें आप।
कभी मुस्काए धीरे से,
कभी करे हैरान,
हर पन्ने में ढूँढ रहा,
अपना एक जहान।
चिप्स, टॉफी सब भूल गया,
ना कोई और ख्याल,
किताबों से दोस्ती उसकी,
सबसे सुंदर कमाल।
नन्हा सा ये प्यारा मन,
सीखे रोज़ नई बात,
ऐसे ही बढ़ता जाएगा,
ज्ञान बनेगा साथ।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
