हनुमान जयंती, अदम्य साहस, निस्वार्थ सेवा और समर्पण के उत्सव का दिन
भारतीय सांस्कृतिक चेतना के आकाश में पवनपुत्र हनुमान एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी आभा युगों-युगों से मानवता को आलोकित कर रही है और आज जब समूचा राष्ट्र हनुमान जयंती का महापर्व मना रहा है तो यह केवल एक तिथि का स्मरण मात्र नहीं बल्कि उस अदम्य साहस, निस्वार्थ सेवा और समर्पण के उत्सव का दिन है जो हर युग में प्रासंगिक है। हनुमान जी का चरित्र शक्ति और विनम्रता के उस अद्भुत समन्वय को दर्शाता है जहाँ ‘अतुलितबलधामं’ होने के बावजूद अहंकार का लेशमात्र भी अस्तित्व नहीं है और यही गुण उन्हें समस्त ज्ञानियों में अग्रगण्य बनाता है क्योंकि वर्तमान समय में जहाँ सामर्थ्य अक्सर उद्दंडता को जन्म देता है वहाँ महावीर हमें सिखाते हैं कि वास्तविक शक्ति वही है जो मर्यादा के भीतर रहकर लोक-कल्याण के लिए समर्पित हो। रामायण के प्रत्येक प्रसंग में वे एक ऐसे संकटमोचन के रूप में उभरते हैं जो बाधाओं को समस्या नहीं बल्कि समाधान की दृष्टि से देखते हैं चाहे वह दुर्गम समुद्र को लांघना हो या लक्ष्मण के प्राणों के लिए संजीवनी बूटी लाना हो क्योंकि उनकी कार्यसंस्कृति स्पष्ट करती है कि यदि लक्ष्य नेक हो और मन में अडिग विश्वास हो तो ‘असंभव’ शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आज के आत्म-केंद्रित युग में हनुमान जी की भक्ति और उनका ‘दास भाव’ हमें यह बोध कराता है कि जब व्यक्ति किसी उच्च उद्देश्य के प्रति स्वयं को समर्पित कर देता है तो उसकी व्यक्तिगत सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और वह ईश्वरीय ऊर्जा का साक्षात माध्यम बन जाता है। विशेषकर आज की युवा पीढ़ी जो मानसिक तनाव और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है उसके लिए हनुमान जी का व्यक्तित्व अनुशासन, एकाग्रता और बौद्धिक चातुर्य का एक जीवंत प्रेरणापुंज है जो सिखाता है कि शारीरिक बल के साथ-साथ मानसिक शुद्धता और विकारों का शमन ही व्यक्तित्व के पूर्ण विकास का मार्ग है। अतः इस पावन अवसर पर उनकी पूजा और अर्चना की वास्तविक सार्थकता तभी है जब हम उनके गुणों का एक लघु अंश भी अपने आचरण में उतार सकें और समाज की बुराइयों के विरुद्ध ‘वज्र’ बनकर खड़े हों तथा पीड़ितों के प्रति ‘कोमल’ सेवा भाव रखें ताकि राष्ट्र निर्माण में अपनी शक्ति का सदुपयोग सुनिश्चित हो सके।
”जहाँ समर्पण गहरा हो, वहीं शक्ति का वास होता है,
संकल्प अटल हो, तो हर संकट का विनाश होता है।”
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
