सामाजिक

अपने सामूहिक दायित्वों से दूर होता समाज : टूटता सामाजिक ताना-बाना और बिखरती भागीदारी

भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता सदियों से उसकी सामूहिकता रही है। परिवार, पड़ोस, ग्राम और नगर—हर स्तर पर लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे, सामूहिक श्रमदान से तालाब, मंदिर, स्कूल और रास्ते बनते थे, और सामाजिक जीवन का संचालन साझा जिम्मेदारी के आधार पर होता था। किंतु पिछले कुछ दशकों में यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। आज समाज पहले की अपेक्षा अधिक शिक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और आर्थिक रूप से विविध हो गया है, लेकिन इसके साथ-साथ सामूहिक कार्यक्रमों में भागीदारी, परस्पर सहयोग और सार्वजनिक कार्यों की निगरानी जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट गिरावट दर्ज की जा रही है। यह परिवर्तन केवल सामाजिक व्यवहार का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह उस ताने-बाने के कमजोर होने का संकेत है, जिसने भारतीय समाज को लंबे समय तक स्थिर और सशक्त बनाए रखा था।

गांवों और छोटे कस्बों में कभी सामूहिक श्रमदान और सहभागिता विकास का प्रमुख आधार हुआ करती थी। कुओं की सफाई, सड़कों की मरम्मत, विद्यालय भवन का निर्माण या किसी गरीब परिवार की सहायता—ये सभी कार्य सामूहिक प्रयासों से पूरे किए जाते थे। पंचायत और मोहल्ला स्तर पर बैठकों में लोग खुलकर अपनी बात रखते थे और निर्णयों को सामूहिक रूप से लागू करते थे। लेकिन आज यह परंपरा तेजी से क्षीण हो रही है। कई ग्राम सभाओं में आवश्यक कोरम तक पूरा नहीं हो पाता, विकास योजनाओं की जानकारी सीमित लोगों तक ही रहती है और आम नागरिक इन प्रक्रियाओं से स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगे हैं। भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय की रिपोर्टों में भी यह तथ्य सामने आया है कि कई राज्यों में ग्राम सभा बैठकों में भागीदारी अपेक्षा से काफी कम रहती है, जिससे स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया प्रभावित होती है।

सामाजिक कार्यक्रमों में सामूहिक भागीदारी की कमी का प्रभाव केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संबंधों की गहराई को भी प्रभावित कर रहा है। पहले विवाह, त्योहार, धार्मिक आयोजन या सामुदायिक उत्सव पूरे मोहल्ले या गांव की सहभागिता से सम्पन्न होते थे। लोग मिलकर आयोजन की योजना बनाते, संसाधन जुटाते और श्रमदान करते थे। इससे न केवल आयोजन सफल होता था, बल्कि समाज में आपसी विश्वास और जुड़ाव भी मजबूत होता था। आज इन आयोजनों का स्वरूप अधिक निजी और सीमित होता जा रहा है। सामूहिकता की जगह प्रायोजित और व्यावसायिक आयोजनों ने ले ली है, जहाँ भागीदारी दर्शक की तरह होती है, सहभागी की तरह नहीं। इससे सामाजिक संवाद और पारस्परिक निर्भरता में कमी आई है।

एक दूसरे की मदद करने की परंपरा भी धीरे-धीरे औपचारिक और संस्थागत ढांचे तक सिमटती जा रही है। पहले पड़ोस में किसी के बीमार पड़ने, घर में आर्थिक संकट आने या किसी दुर्घटना की स्थिति में आसपास के लोग स्वयं आगे बढ़कर सहायता करते थे। अब ऐसी परिस्थितियों में लोग अधिकतर सरकारी योजनाओं, बीमा या निजी सेवाओं पर निर्भर हो गए हैं। यह परिवर्तन आधुनिक संस्थाओं की उपलब्धता का परिणाम तो है, लेकिन इसके साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना में भी कमी आई है। शहरी क्षेत्रों में तो स्थिति और अधिक जटिल है, जहाँ पड़ोसियों के बीच परिचय तक सीमित रह गया है और आपसी सहयोग की परंपरा लगभग समाप्तप्राय है।

सामूहिक रूप से विकास कार्यों की देखरेख करना भी किसी समय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी। गांवों में बन रही सड़क, विद्यालय या पंचायत भवन की गुणवत्ता और प्रगति पर स्थानीय लोग नजर रखते थे, जिससे कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहती थी। आज अनेक स्थानों पर यह निगरानी कमजोर पड़ गई है, जिसके परिणामस्वरूप अधूरे निर्माण, निम्न गुणवत्ता और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं। जब समाज स्वयं अपने क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों पर ध्यान नहीं देता, तो ठेकेदार और अधिकारी मनमानी करने लगते हैं। कई राज्यों में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि स्थानीय स्तर पर सामुदायिक निगरानी के अभाव में विकास योजनाओं की प्रभावशीलता घट जाती है और संसाधनों का दुरुपयोग बढ़ता है।

सामाजिक ताने-बाने के कमजोर होने के पीछे अनेक कारण कार्यरत हैं। नगरीकरण, एकल परिवार व्यवस्था, रोजगार के लिए पलायन, डिजिटल जीवनशैली और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने लोगों के समय और प्राथमिकताओं को बदल दिया है। अब व्यक्ति अपने परिवार और करियर तक सीमित होता जा रहा है, जबकि समुदाय के लिए समय निकालना कठिन होता जा रहा है। इसके अतिरिक्त, समाज में आर्थिक असमानता और वर्गीय विभाजन बढ़ने से भी सामूहिकता प्रभावित हुई है। जब समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन स्तर और अवसरों में अत्यधिक अंतर होता है, तो साझा मंचों पर संवाद और सहयोग की संभावना कम हो जाती है।

राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं ने भी इस स्थिति को प्रभावित किया है। कई बार स्थानीय निकायों और प्रशासनिक तंत्र ने नागरिकों को निर्णय-प्रक्रिया से पर्याप्त रूप से जोड़ने का प्रयास नहीं किया, जिससे लोगों में यह धारणा बनी कि उनकी भागीदारी से कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं होता। जब नागरिकों को लगता है कि योजनाएँ ऊपर से तय होती हैं और उनकी भूमिका केवल औपचारिक है, तो वे धीरे-धीरे इन प्रक्रियाओं से दूरी बना लेते हैं। परिणामस्वरूप, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की जो परिकल्पना पंचायती राज और नगर निकायों के माध्यम से की गई थी, वह व्यवहार में उतनी प्रभावी नहीं हो पाती जितनी अपेक्षित थी।

सामूहिक कार्यक्रमों में समाज की विफलता का एक महत्वपूर्ण पहलू युवाओं की घटती भागीदारी भी है। शिक्षा और रोजगार की दौड़ में युवा वर्ग सामाजिक गतिविधियों को गौण मानने लगा है। स्वयंसेवा, सामाजिक सेवा या सामुदायिक नेतृत्व जैसी गतिविधियाँ उनके लिए करियर से सीधे जुड़ी नहीं दिखतीं, इसलिए वे इनसे दूर रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि किसी भी समाज के भविष्य का निर्माण युवाओं की सामाजिक चेतना और सहभागिता पर ही निर्भर करता है। यदि युवा वर्ग सामूहिक जिम्मेदारियों से दूर हो जाएगा, तो सामाजिक नेतृत्व और जनहित के मुद्दों पर संवेदनशीलता दोनों कमजोर पड़ेंगे।

डिजिटल माध्यमों ने लोगों को सूचनाओं और अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इससे वास्तविक सामाजिक भागीदारी कई बार आभासी गतिविधियों तक सीमित हो जाती है। लोग ऑनलाइन समूहों में चर्चा तो करते हैं, परंतु जमीनी स्तर पर किसी सामूहिक कार्यक्रम या सामाजिक पहल में भाग लेने से कतराते हैं। इससे सामूहिकता का अनुभव और अभ्यास दोनों कमजोर पड़ते हैं। सामाजिक संबंधों की जो गहराई प्रत्यक्ष संवाद और साझा श्रम से बनती है, वह केवल आभासी संपर्क से संभव नहीं है।

इस प्रवृत्ति के दीर्घकालिक परिणाम समाज के लिए चिंताजनक हो सकते हैं। जब सामूहिक कार्यक्रमों और सहयोग की परंपरा कमजोर होती है, तो संकट के समय समाज की सामूहिक क्षमता भी घट जाती है। प्राकृतिक आपदाओं, महामारी या किसी सामाजिक तनाव की स्थिति में वही समाज अधिक सक्षम सिद्ध होते हैं, जहाँ लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं और मिलकर कार्य करने की आदत रखते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी यह स्पष्ट हुआ कि जिन समुदायों में स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवी समूह सक्रिय थे, वहाँ राहत और सहायता कार्य अधिक प्रभावी रहे।

समाधान की दिशा में सबसे पहला कदम यह स्वीकार करना है कि सामूहिकता की यह कमी केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की चुनौती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से युवाओं को सामुदायिक सेवा और सामाजिक नेतृत्व के अवसर प्रदान करने होंगे। स्थानीय स्तर पर ग्राम सभा, मोहल्ला समिति और नागरिक मंचों को सक्रिय बनाना होगा, ताकि लोग निर्णय-प्रक्रिया में स्वयं को सहभागी महसूस करें। इसके साथ-साथ प्रशासन को भी पारदर्शिता और संवाद बढ़ाकर यह विश्वास दिलाना होगा कि नागरिक भागीदारी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविक परिवर्तन का माध्यम है।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि कोई भी समाज केवल कानूनों और संस्थाओं से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, सहयोग और साझा जिम्मेदारी से मजबूत बनता है। यदि समाज सामूहिक कार्यक्रमों, पारस्परिक सहायता और विकास कार्यों की निगरानी जैसे क्षेत्रों में लगातार विफल होता रहेगा, तो लोकतांत्रिक ढाँचा भले औपचारिक रूप से कायम रहे, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए समय की आवश्यकता है कि हम व्यक्तिगत सफलता और सुविधा के साथ-साथ सामूहिक दायित्वों की ओर भी पुनः ध्यान दें और सामाजिक ताने-बाने को फिर से सुदृढ़ बनाने की दिशा में ठोस और सतत प्रयास करें।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563