गीतिका/ग़ज़ल

अटल विश्वास का दीप

यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है,
अंधियारे पथ में भी दीपक संभलता है।

झंझाओं की गोद में काँपती लौ सही,
पर विश्वास का स्पर्श उसे संबल देता है।

हवा की ओट में भी जो दीप जलता है,
वह मन के गूढ़ किसी कोने से पलता है।

निश्छल आस्था की नीरव छाया तले,
हर असंभव स्वप्न भी आकार बदलता है।

जब अंतर में प्राणों का संगीत जागे,
तब मौन भी अपना अर्थ सरल करता है।

वेदना की धार में भी दीप हँसता रहे,
अश्रु बनकर भी उजियारा छलकता है।

टूटती हर आस में एक ज्योति शेष रहे,
वही जीवन को फिर से संवरता है।

विश्वास के पंख लिए उड़े मन अनंत,
हर बाधा के पार नया सवेरा मिलता है॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh