कंगाल होते रिश्ते
रिश्तों में अब न पहले-सा वो एहसास है,
हर शख़्स के लहजे में स्वार्थ का लिबास है।
मिलते हैं मुस्कुरा के सभी आज इस तरह,
हर मुस्कान के पीछे छुपा संत्रास है।
छत एक ही सही मगर दिल हैं दूर-दूर,
हर कमरे में बँटा हुआ-सा विश्वास है।
मुसीबतों में जो थामे आकर हाथ को,
ऐसा कहाँ जहाँ में कोई ख़ास-ओ-ख़ास है।
जज़्बात बिक रहे हैं यहाँ दौलतों के संग,
हर दिल में अब तो सिर्फ़ हिसाबों का वास है।
रिश्तों की थाली खाली, दिल भी उदास है,
हर शख़्स आज अपने मतलब के पास है।
बातों में अब वो अपनापन रहा ही नहीं,
लफ़्ज़ों में मीठापन, दिल में कपट का वास है।
‘सौरभ’ किसे कहें हम अपना या अज़ीज़,
हर रिश्ते के बदन पे फ़रेबों का लिबास है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
