आत्मकथा

मेरी कलम सिर्फ मानवता के लिए चलती है

मैं हास्य-व्यंग्य से समाज को सुधारने की कोशिश करता हूँ और एक सच्चे भावों से सच्चाई लिखना चाहता हूँ। आम आदमी की परेशानियां देखकर मैं आहत होता हूँ। इसलिए अपनी रचनाओं में सदैव सच का पैरवी करता हूँ। मैं झुककर नहीं लिखता हूँ। मेरी कलम एक तीखा तेवर अपनाती है। यही मेरी एक टेढ़ी खासियत है।

जब मैं किसी को आहत होते देखता हूँ तो मेरी कलम की धार और तीव्र हो उठती है। इसकी धार तलवार की धार से भी तेज होती है। जिस पर मेरे कलम की धार का वार होता है। वह धराशायी हो जाता है या विकलांग अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

मैं चाहता है कि मेरी कलम किसी की गिरवी न बने न तो पराधीन रहे। अपनी कलम की ताकत संतोष की गोद में रखना चाहता हूँ। मै सिर्फ मानवता के लिए अपनी कलम चलाता हूँ। मैं अपने निजी जीवन में भी इंसानियत को तरजीह देता हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं केवल सच लिखता हूँ। इंसानियत की बात करता हूँ और अपने जीवन में भी इस सच और इंसानियत को धारण करता हूँ।

गलत लोगों की पैरवी के लिए मैं कभी नहीं खड़ा होता हूँ। मेरी कलम कभी पैरवी ऐसे लोगों की नहीं करेगी। समाज के बिगड़े रुप पर तंज कसता हूँ ताकि समाज के अंदर जो विकार है वह खत्म हो जाये और अंधेरे में जी रहे लोगों को रोशनी दे सकूँ। मेरी अंतिम ख्वाहिश है।

यही सब मेरी ताकत है। मुझे अंदर से मजबूती मिलती है। एक आंतरिक शक्ति मिलती है जो मुझे इन वीभत्स रुपों से लड़ने का जुनून बना रहता है। मेरी कलम किसी गुटबाजी से नहीं थमती है। वह अपना हो या पराया लेकिन गलत की तरफदारी कोई करता है तो मेरी कलम उसको डांटती तथा फटकारती है। उसको सही राह पर चलने को प्रेरित करती है।

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

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