और कोई चारा नहीं है
सोच रखा है लिखूंगा तुम्हारे लिए
चंद महत्वपूर्ण पंक्तियां,
मगर उबर लेने दो मुझे
मेरी कुछ परेशान करती उलझनों से,
अभी तामील कर रहा हूं आदेश
अपने आप को मानने वाले विज्ञ जनों से,
मेरा भी तो ये सपना है कि
तुमसे बात करूं खुलकर,
दुनियादारी के बीच रह क्या करना है
अच्छी तरह समझा दूं मिलकर,
होता है महसूस कि तू आकर्षित है मुझसे,
पर मिलकर ही बताऊंगा कि
मुझे क्या उम्मीद है तुमसे,
उम्मीद हां वहीं उम्मीद
जो लगाया था हमारे महापुरुषों ने
हमसे, हमारे इस समाज से,
जो उबर नहीं पा रहे
घर,परिवार,हंसी और अपने आप से,
जैसे मैं दूर जा चुका था उस राह से,
गिरता जा रहा था खुद की निगाह से,
अपनों को परेशानियों में देखना
मुझे बिल्कुल भी गंवारा नहीं है,
इस मिशन की राह में चलने के सिवा
और कोई चारा नहीं है।
— राजेन्द्र लाहिरी
