कविता

छंद मुक्त कविता – जीवन एक रंगमंच

जीवन एक रंगमंच है—
पर निर्देशक कोई और है,
हम तो बस
उसके संकेतों पर चलते पात्र हैं।
जन्म के साथ ही
हाथ में थमा दी जाती है एक भूमिका,
न हम चुनते हैं संवाद,
न ही मंच का विस्तार—
फिर भी निभाना पड़ता है
हर दृश्य पूरी निष्ठा से।
कभी हँसी के दृश्य,
कभी आँसुओं की पंक्तियाँ,
कभी मिलन का संगीत,
तो कभी वियोग की खामोशी—
सब कुछ जैसे पूर्व-लिखित।
मैं भी इस मंच पर
कभी बेटी, कभी माँ,
कभी सृजन की साधिका बनकर
अपने हिस्से के पात्र निभाती रही हूँ—
शब्दों में ढूँढती रही
अपने होने का अर्थ।
मोह, माया, अहंकार—
ये सब वेशभूषाएँ हैं,
जो बदलती रहती हैं
समय के संकेत पर।
और आत्मा…
वह तो केवल साक्षी है—
न हँसती है,
न रोती है,
बस देखती है
इस नश्वर अभिनय को।
जब अंत में
पर्दा गिरता है,
तब उतर जाते हैं सभी मुखौटे,
और शेष रह जाता है
केवल सत्य—
कि हम कभी पात्र थे ही नहीं,
हम तो उस शाश्वत चेतना के अंश हैं…
और तब,
शब्द भी शांत हो जाते हैं—
सिर्फ एक अनुभूति रह जाती है…यही सत्य है
यही “मृदुल”कहती है।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016