गीत/नवगीत

खाड़ी युद्ध

जैसे ही युद्ध का बिगुल बजा
तमाम देशों में मच गया कोहराम
हजारों लोग अब तक मारे जा चुके
विश्व भर के बाजार हो गये धड़ाम।।

हर तरफ है अविश्वास का माहौल
क्रूर शासकों की गयी नैया डोल
मिसाइलों, बमों की बरसात हो रही
एक दूसरे पर रहे सब हल्ला बोल।।

अभी तो हुआ है बस एक ही माह
धुआं ही धुआं फैला चहुं ओर है
अर्थव्यवस्था सब छिन्न-भिन्न हो गयी
इस जंग का न कोई ओर -छोर है ।।

तेल के संकट ने लिया है सबको घेर
देखते हैं कौन किसका रखवाला
मंहगाई की मार से है जन-जन बेचैन
विषम परिस्थितियों से पड़ा है पाला।।

डर है कहीं विश्वयुद्ध ही न हो जाए
परमाणु के साए में दुनिया सो जाए
पहले ही हालात काफी तनावपूर्ण हैं
इंसान का अस्तित्व ही न खो जाए ।।

संयुक्त राष्ट्र संघ हो गया प्रभावहीन
दिख रहा है वह तो बिल्कुल दीन-हीन
कोई देश उसको न तरजीह दे रहा
मानो उसकी शक्ति पड़ गई हो क्षीण।

शांति समझौता जो करवाते फिरते थे
अब कर रहे वे बमों की बौछार
ये कैसे शांति के सौदागर थे
जो स्वयं बन बैठे युद्ध के पक्षकार ।

दिखा कथनी-करनी में स्पष्ट अंतर
मध्यस्थता की सब बातें हुईं छू-मंतर
तेल पर कब्जे की लड़ाई है यह सब
और झूठ का दौर जारी है निरंतर।।

भारत के लिए समय है चुनौतीपूर्ण
और सामने खड़ी हैं बाधाएं भरपूर
महंगाई की मार भी पड़ सकती है
और रुपया भी हो रहा है चूर -चूर।

झूठ और अफवाहों का है बाजार गर्म
लगती नही है किसी की नीयत ठीक
बातें तो जरूर करते हैं शांति की
अंदर ही अंदर रहे एक दूसरे को झीक

कौन किसके साथ है कुछ पता नही
सच्चाई का पता कुछ भी चलता नही
वार और प्रतिवार का जोर जारी है
अब यह दौर भी ज्यादा खलता नही

हे ईश्वर इनको जल्द सद्बुद्धि दीजिए
जन मानस का सन्ताप हर लीजिए
युद्ध से किसी का कुछ न भला होगा
संवाद का मार्ग जल्द प्रशस्त कीजिए।

युद्ध से किसी का कुछ न भला होगा
संवाद का मार्ग जल्द प्रशस्त कीजिए।

— नवल अग्रवाल

३१ मार्च २०२६

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई