कविता

कविता – मैं सिमटती गई

कभी घूंघट,कभी बुर्के के पीछे मैं छिपती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा उसमें मैं सिमटती गई।

अपने प्रेम और त्याग से जिन्दगी की माला पिरोती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा उसमें मैं सिमटती गई।

मेरी जिन्दगी पर मुझे छोड़ सबकी हुकूमत चलती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा, उसमें मैं सिमटती गई।

समाज के बनाए नियम,कायदों में मेरी जिन्दगी पिसती रही,
तुमने जिस मर्यादा में रखा उसमें मैं सिमटती गई।

अपनी इस घुटन भरी जिन्दगी से खुली हवा में जाने को
मैं तड़पती रही, तरसती रही।
तुमने जिस मर्यादा में रखा उसमें मैं सिमटती गई।

— अंकिता जैन अवनी

अंकिता जैन 'अवनी'

लेखिका/ कवयित्री अशोकनगर मप्र jainankita251993@gmail.com