लघुकथा

शून्य

छुटकी संजना कब से रोये जा रही थी।अभी-अभी बडे भैया अमित की शादी हुई थी। कितनी उमंग, कितना जोश, कितना उत्साह था उसके मनमें। नई भाभी का हर पल ख्याल रखती थी वह।

” भाभी, ठंडाई पी लो। बहुत गर्मी है।”

उसे पता नहीं था, अमित भैया किसी काम से जल्द घर आये है और भाभी के साथ है।

” क्यों दिनभर हमारी जासूसी में लगी रहती हो। कोई न कोई बहाना बनाकर आ जाती हो।”

” नहीं भैया..मैं तो..।”

शब्द अभी मुंह में ही रह गये थे कि भैया ने बुरी तरह लताडा,

” जाओ यहाँ से। मुँह ताकते क्यों खडी हो?”

हरपल उसे चाहनेवाले, उसकी हर जिद की पूर्ति करनेवाले अमित भैया। वह अवाक देखती रह गई। 

“अब तो जाओ न। बेशरमी की भी हद होती है।”

संजना की रुलाई फूट पडी। 

मेरे भैया, प्यारे भैया कितना इतराती थी वह।

माँ सब कुछ समझ गई।

दोनों ने अपनी दुनिया समेट ली। 

कई बार सोचती है माँ, क्या खून का रिश्ता इतने जल्दी भुलाया जा सकता है?

संजना रोते-रोते गोदी में ही सो गई है और माँ की आँखों में शून्य तैर रहे है।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८