जीत
जीत का जश्न मना रहे थे
घर-परिवार के सब लोग। जोश उल्लास के साथ गाने की धुन पर सब थिरक रहे थे।
लाडला अंकित राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में ढेर सारे पदक लाया था। वाह-वाह हो रही थी उसकी।
झूम झूम-झूम सब आनंद ले रहे थे कि अचानक अंकित का पैर फिसल गया। दर्द से कराह उठा वह।
” कैसे दौडुंगा अंतरराष्ट्रीय मैराथन में?”
“मेरा पैर। ओफ्हो! कितना दर्द हो रहा है।”
उदास वह शून्य में ताकता रहा। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। 3 महिने प्लास्टर रहेगा। क्या करूं?”
उसके प्रशिक्षक साथ ही थे। ढाढस बंधाते हुए उन्होंने उसे समझाया।
उसके आत्मविश्वास को झकझोर कर चेतन किया।
” कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती।”
” तुम्हे खुद अपना संबल बनना होगा।”
” मार्गदर्शन लेते आगे बढना होगा।”
बेमन से तीन महिने के समय मे उसने अपने कोच से खेल की बारीकियां सीख ली। धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढता गया।
मन में ठान लिया उसने, जीत हासिल कर रहूंगा। तिरंगा फहराकर ही आऊंगा। मेरे देश का गौरव बढाऊँगा।
आज उसका सपना सच हुआ था।
उसके नाम का जयघोष हो रहा था। गर्व से उसका सीना चौडा हो रहा था।
जय भारत। जय हिंद के जयकारे के साथ खेलप्रेमियों ने उसे अपने कांधे पर उठा लिया था।
