कविता

बाग  हरियाला  सदा

शान्ति का पथ धार लो।

जीव करुणा तार लो।।

नेह से विस्तार हो।

सौख्य धुन संस्कार हो।।

भाव समता हो पगी।

धर्म हित हो बंदगी।।

प्रीति की हो बानगी।

संयमी हो सादगी।।

विश्व में आनंद हो।

द्वेष दंभ न फंद हो।।

प्रेम से रहना सभी।

बाग पुष्पित हो तभी।।

त्रासदी हम क्यों सहे?

मानवी मन दुख गहे?

एक सनकी सोच है।

क्रोध मन की मोच है।।

रोक दो इस भांप को।

शस्त्र  के  संताप को।।

बाग  हरियाला  सदा।

आस सब मन सर्वदा।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८