कविता

हर पल अकेला

हर लम्हा हर पल हैं अकेला,
बस तेरी यादों का रैला,
खामोश हैं राहें चुप हैं सितारे,
सूना सा मन का हर कोना,
रातों को रौशन कर जाता हैं,
चांद को देखो कितना अकेला,
मैं भी अकेली तू भी अकेला,
चुप हैं जैसे सारा मेला,
हंसना अकेला रोना अकेला,
जीवन जैसे सूना रैला,
भीड़ भरी इन राहों में भी,
दिल का कोना क्यों रहे अकेला,
दुःख के बाद सुख आयेगा,
दूर करो सब मन का मैला,

— आसिया फारुकी

*आसिया फ़ारूक़ी

राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका, प्रधानाध्यापिका, पी एस अस्ती, फतेहपुर उ.प्र