ग़ज़ल
मेरे जलते बुझते चिराग़ को, तेरी आंधियों से गिला नहीं,
जो सहा हैं खुद ही सहा मगर, कभी तुझसे कुछ भी कहा नहीं।
तेरी खुशबुओं में रची बसी, मैं ये सोचती रही देर तक,
जिसे पा के कोई न चाह हो, मुझे वो खुदा ही मिला नहीं।
कई बार तो स्लेट पर भी, मेरे आंसुओं ने ग़ज़ल लिखी।
वो जिसकी रूह सी शख्सियत, जो हंसी में कुछ छुपाए थी ।
वो गया तो उसके मिज़ाज सा, मुझे शख्स कोई मिला नहीं।
मुझे मिटाना चाहे तो मिटा मुझे उसका कोई गिला नहीं।
कि खुदा की मर्ज़ी बगैर तो, कहीं कोई पत्ता हिला नहीं।
ये पहाड़ खाक पहाड़ हैं, ये अज़ाब खाक आज़ाब हैं।
जिसे मंजिलों का जुनून हो, कभी मुश्किलों से डरा नहीं।
— आसिया फारुकी
