ग़ज़ल
आ खड़े हम हैं हुये अब मुश्किलों के मोड़ पर।
हो परेशां हम गये हैं साज़िशों के मोड़ पर।।
था गुनाह कौन-सा हमने किया फँसते गये।
फैसले होते नहीं हैं सज़िशों के मोड़ पर।।
आँधियाँ जो हैं चलीं दीवानगी की हद हुई।
थे तभी हम तो खड़े ही शातिरों के मोड़ पर।।
की मुहब्बत ने ख़ता हम तो लुटे ही रह गये।
कर सके शिकवा नहीं हम जालिमों के मोड़ पर।।
आज वे गद्दार निकले देश को धोखा दिया।
आज तो निर्दोष मरते क़ातिलों के मोड़ पर।।
अब बमों की ये बरसातें घोर होती हीं चलीं।
लग रहा है आ गए हम हादसों के मोड़ पर।।
जंग यह ऐसी छिड़ी रुकती नहीं यह रात भर।
हैं अभी जैसे खड़े ज्यों दौलतों के मोड़ पर।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
