जिसकी भात, उसकी बात
एक हमारे मित्र ने बताया कि उधर मत जाना। वही पर एक महान व्यक्ति जो आधुनिक युग में साहित्य, संगीत तथा कला के पारंगत विद्वान रहते हैं। इनके पास अपना खुद का सींग तथा पूंछ है और किसी को बख्शते नहीं हैं।
मुझे नसीहत मिली थी लेकिन निर्भीक प्राणी की तरह करीब से गुजर रहा था तभी उसने अपनी साहित्यिक पूंछ से लपेट कर दो पटकनिया दी। मेरे तो प्राण पखेरू उड़ जाते। संयोग से यमराज जी अपने ससुराल में थे और मुंह मीठा कर रहे थे।
वे अपने दम पर साहित्य की दुनिया में दुकान चला रहे थे। उनके घर पर साहित्यकारों का अड्डा था। एक से एक विद्वान उनके घर पधार कर सिर नवाते थे और वे अपने मुख से महिमामंडित कर उनको रसमलाई, दहीबड़ा, लस्सी तथा तरह-तरह के पकवान खिलाकर विद्वानों के बीच में महान विद्वता का माला पहन लिये थे।
सारे साहित्यकार उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं जबकि कभी भी कोई साहित्यिक रचनायें नहीं दी। किसी कला में मर्मज्ञ भी नहीं हैं। संगीत का कोई अक्षर ज्ञान नहीं लेकिन रसमलाई, दहीबड़ा खाने वालों ने ऐसा तारीफों का शमां बांध दिया कि मैं भी उनका मुरीद हो गया।
एक बार हमको भी न्यौता भेजे। एक साहित्यिक बैठकी थी। हमको भी तरह-तरह का पकवान खिलाया गया। गले तक भर-भर कर खिलाया। मन खुश हुआ, समझो मोगैम्बो खुश हुआ जबकि साहित्य संगीत तथा कला का ककहरा तक नहीं जानता था।
लेकिन भूखा व्यक्ति को जो भात मछली देगा तो बेचारा करेगा क्या? इतने मनोयोग से उनकी विद्वता का बखान किया कि वह व्यक्ति जो साहित्य संगीत तथा कला से विहीन था। भरपेट भोज्य पदार्थ की ताकत ने उसे सींग तथा पूंछ वाला विद्वता का महारथी घोषित करना पड़ा अर्थात जिसकी भात, उसकी बात।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
