कूड़े में ढूँढे खुशी
रोटी की मजबूरियाँ, छीन गई पहचान,
बचपन बोझा ढो रहा, सूना हर अरमान॥
हाथों में गर कलम हो, लिखते नए विचार,
आज वही कूड़े तले, खोजें अपना सार॥
गली-गली में ढूँढते, अपना ही अधिकार,
बचपन रोता रह गया, जग करता व्यापार॥
खिलने वाली उम्र में, मुरझाए अरमान,
कूड़े में ढूँढे खुशी, रोता हिंदुस्तान॥
खेल-खिलौने छिन गए, छूटा बचपन साथ,
छोटे-छोटे हाथ अब, नाप रहे फुटपाथ॥
नन्हे हाथों में कहाँ, सपनों की उड़ान,
कूड़े में ढूँढे खुशी, रोती नन्ही जान॥
स्कूलों की घंटी कहाँ, कहाँ गई वो तान,
अब तो केवल गूँजती, मजदूरी की शान॥
छोटे-छोटे स्वप्न थे, आँखों में उजियार,
मजदूरी की धूल ने, कर डाला बेकार॥
मिट्टी में मिलते हुए, सपनों के आकार,
बचपन खोता जा रहा, होकर के लाचार॥
मुस्कानें सब छिन गईं, छिन गया विश्वास,
बचपन के इस दर्द का, कौन करे एहसास॥
ये शब्द नहीं, समाज का आईना हैं।
आइए मिलकर कोशिश करें—हर बच्चे के हाथ में कलम हो, न कि बोझ।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
