गीतिका – नील गगन की छटा
नील गगन की विमल छटा है।
नहीं तनिक भी कहीं घटा है।।
चैत्र मास मधु बाँटे प्रतिदिन,
अलि गुंजन से बाग पटा है।
तपने लगा गगन में सूरज,
लटकी वट की सघन जटा है।
ब्रह्म मुहूरत में आ चहके,
चिड़िया, प्रभु का नाम रटा है।
वन में गए भ्रमण करने हम,
मिला न किंचित एक गटा है।
करती है कल – कल सुरसरिता,
नहीं नीर में कहीं भटा है।
राजा है वसंत ऋतुओं का,
‘शुभम’ यत्र सर्वत्र खटा है।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’
